रायपुर।“हम बच्चों को दो वक्त का खाना तो खिला रहे हैं, लेकिन अपने ही घर में चूल्हा जलाना मुश्किल हो गया है।”
यह दर्द है उन मध्यान्ह भोजन रसोईया कर्मचारियों का, जो बेहद कम मानदेय में वर्षों से सरकारी स्कूलों में सेवा दे रहे हैं।
रसोईया कर्मचारियों का कहना है कि सरकार उनकी आवाज सुनने को तैयार नहीं है। परिवार के पालन-पोषण के लिए उन्हें दर-दर भटकना पड़ रहा है। इतना मेहनत-भरा काम करने के बावजूद जो वेतन मिलता है, वह एक सप्ताह का खर्च निकालने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। बच्चों की पढ़ाई, इलाज और घर की अन्य जरूरतें तो बहुत दूर की बात हो गई हैं।
कर्मचारियों ने साफ शब्दों में कहा है कि उनकी एक ही मांग है — कलेक्टर गाइडलाइन के अनुसार नियमित और सम्मानजनक वेतन। जब तक यह मांग पूरी नहीं होती, तब तक वे प्रदर्शन स्थल से हटने वाले नहीं हैं।
रसोईया कर्मचारियों का यह भी कहना है कि चाहे जान ही क्यों न चली जाए, लेकिन अब पीछे हटने का सवाल नहीं उठता।
प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बच्चों की थाली भरने वालों की थाली आज खुद खाली है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को यह सच्चाई नजर नहीं आ रही।
फिलहाल मध्यान्ह भोजन रसोईया कर्मचारियों का अनिश्चितकालीन आंदोलन लगातार जारी है और आने वाले दिनों में इसके और तेज होने के संकेत हैं।







