बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के ऐलान के साथ ही राज्य की राजनीति एक बार फिर उसी पुराने मोड़ पर खड़ी दिख रही है — जहाँ ‘साफ सियासत’ के वादे और ‘बाहुबली उम्मीदवारों’ की सच्चाई एक साथ चलती है। एक ओर राजनीतिक दल जनता के सामने ‘गुंडई-मुक्त राजनीति’ का वादा करते हैं, तो दूसरी ओर उन्हीं दलों के टिकट पर जेल में बंद या आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं।
दानापुर से रीतलाल यादव का उदाहरण इस विरोधाभास को उजागर करता है। हत्या, रंगदारी और धमकी जैसे 11 गंभीर मामलों में आरोपी रीतलाल यादव फिलहाल जेल में हैं, फिर भी राजद ने उन्हें प्रत्याशी बनाया है। दिलचस्प यह है कि लालू प्रसाद यादव, मीसा भारती और तेजस्वी यादव जैसे पार्टी के शीर्ष नेता खुद उनके समर्थन में प्रचार कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जब शीर्ष नेतृत्व ही ऐसे उम्मीदवारों के पीछे खड़ा हो, तो ‘स्वच्छ राजनीति’ का दावा कितना सच्चा है?
इसी तरह लालगंज में भी बाहुबली राजनीति की परंपरा बरकरार है। यहाँ राजद ने शिवानी शुक्ला को टिकट दिया है, जो सजायाफ्ता मुन्ना शुक्ला की बेटी हैं। शिवानी का बयान — “मैं बाहुबली की बेटी हूं, सवाल वही होंगे जो हम चाहेंगे” — इस बात का प्रतीक है कि बिहार की सियासत में बाहुबली परिवारों की पकड़ अब भी अटूट है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति इसलिए कायम है क्योंकि पार्टियाँ सिद्धांत से अधिक ‘विनिंग एबिलिटी’ यानी जीतने की क्षमता को प्राथमिकता देती हैं। बाहुबली उम्मीदवार अपने प्रभाव और निजी नेटवर्क के दम पर चुनावी समीकरण साध लेते हैं, भले ही इससे लोकतंत्र की साख पर आंच क्यों न आए।
हालांकि, दूसरी तरफ प्रशासन ने इस बार मतदान प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष और भयमुक्त बनाने की तैयारी की है। तीन-लेयर सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) बूथों के भीतर और बाहर तैनात रहेगा, जबकि दियारा और टाल जैसे कठिन इलाकों में घुड़सवार दस्ते गश्त करेंगे। ये दस्ते नदी पार और कच्चे रास्तों वाले क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखेंगे। साथ ही, ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों से हर गतिविधि पर नजर रखी जाएगी।
प्रशासन का दावा है कि सुरक्षा इतनी मजबूत की गई है कि हर मतदाता बिना किसी डर या दबाव के मतदान केंद्र तक जा सके।
फिर भी, असली चुनौती यह है कि जब राजनीतिक दल खुद ‘साफ सियासत’ की जगह ‘सशक्त बाहुबली’ को प्राथमिकता दें, तो सुरक्षा व्यवस्था भी लोकतंत्र की उस सच्चाई को नहीं बदल सकती — कि बिहार में आज भी बाहुबल, सियासत का सबसे भरोसेमंद ‘हथियार’ बना हुआ है।







