प्रदेश में हुए भीषण रेल हादसे ने पूरे राज्य को शोक में डुबो दिया है। चारों ओर चीख़-पुकार, असहाय परिजनों की आंखों में आंसू और अस्पतालों में तड़पते घायल — यह दृश्य किसी का भी दिल पिघला दे। देशभर से शोक संदेश आने लगे हैं, हर कोई मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट कर रहा है।
लेकिन, इसी ग़मगीन माहौल के बीच प्रदेश के मुखिया राज्योत्सव के जश्न में व्यस्त नज़र आए।

मंच सजा था, रोशनी चमक रही थी, और जनता दर्द में थी। सवाल उठना लाज़मी है — क्या उत्सव मनाने की यही सही घड़ी थी?
मुख्यमंत्री अब तक दुर्घटना स्थल पर नहीं पहुंचे। पीड़ित परिवारों से मुलाक़ात तक नहीं हुई। शायद यह वही पल है जब सत्ता के गलियारों में संवेदनशीलता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। लोग सिर्फ़ आर्थिक मदद नहीं, बल्कि अपने मुखिया से एक मानवीय स्पर्श की उम्मीद रखते हैं।थोड़ी संवेदना, थोड़ी जिम्मेदारी और थोड़ी आत्ममंथन की जरूरत है मुख्यमंत्री जी। क्योंकि नेतृत्व का असली अर्थ सिर्फ़ कुर्सी संभालना नहीं, बल्कि जनता के दुख-दर्द को महसूस करना होता है।



