पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में टिकट वितरण को लेकर राजनीतिक दलों में हलचल तेज हो गई है। पैराशूट प्रत्याशियों को टिकट दिए जाने से पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष है। बताया जा रहा है कि अब तक 35 से अधिक नेता दल बदल चुके हैं, जिससे टिकट वितरण की प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।
राज्य के प्रमुख दल—भाजपा, जदयू, राजद, कांग्रेस, लोजपा (आर) और हम, रालोमो जैसे क्षेत्रीय दलों में दलबदल की रफ्तार बढ़ती जा रही है। जिन कार्यकर्ताओं ने सालों तक अपनी सीट के लिए मेहनत की थी, अब वे खुद को हाशिये पर पा रहे हैं।
पैराशूट नेताओं की एंट्री से बढ़ा असंतोष
पिछले चुनाव की तरह इस बार भी कई “पैराशूट नेता” आखिरी समय में दूसरे दलों से आकर टिकट हासिल कर रहे हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में 42 पूर्व सांसद, मंत्री और विधायक पाला बदल चुके थे, जिनमें से 22 उम्मीदवार जीतने में सफल रहे थे। इस बार की रफ्तार को देखते हुए पिछले रिकॉर्ड के टूटने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
कार्यकर्ताओं में मायूसी और नाराजगी
वीरचंद पटेल पथ पर टिकट की आस में डेरा डाले कार्यकर्ता विनोद कुमार कहते हैं, “हम पांच साल से अपने नेता के लिए काम कर रहे थे, लेकिन अब विरोधी दल के पूर्व सांसद की पत्नी को टिकट मिल गया। अब विकल्प ही क्या बचा है?”
ऐसे कई समर्पित कार्यकर्ता अब खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं, जो लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे थे।
दल-बदल और नैतिकता पर उठे सवाल
राज्य एडीआर समन्वयक राजीव कुमार का कहना है कि चुनाव के दौरान दल-बदल लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। उन्होंने कहा, “यह वैसा ही है जैसे कोई पांच साल तक एक सिलेबस पढ़े और परीक्षा में कहा जाए कि उससे प्रश्न नहीं आएगा। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटना स्वाभाविक है।”
उनके अनुसार, अब राजनीति में नैतिकता और विचारधारा की कमी साफ दिखाई दे रही है।
मतदाताओं के हाथ में है असली फैसला
राजीव कुमार ने कहा कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय मतदाता ही करते हैं। अगर नैतिकता और समाजसेवा के मूल्यों को महत्व दिया जाए, तो धनबल और बाहुबल की राजनीति खुद खत्म हो सकती है।



