छत्तीसगढ़ की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था इन दिनों दो बड़े सवालों के बीच उलझी हुई है।
पहला सवाल—सरकार ने मार्च 2026 तक राज्य से नक्सलवाद को जड़ से मिटाने का ऐलान कर दिया है।
लेकिन दूसरा और कहीं ज्यादा पेचीदा सवाल यह है कि तोमर बंधु की गिरफ्तारी आखिर कब होगी?
नक्सलवाद पर सरकार का रोडमैप साफ़ है
राज्य सरकार ने दशकों से फैले नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए रणनीति बनाई है। ऑपरेशनों की टाइमलाइन तय है और सुरक्षा बल लगातार अभियान चला रहे हैं। सरकार जनता को भरोसा दिला रही है कि तय समयसीमा के भीतर छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा।
तोमर बंधु पर चुप्पी क्यों?
जब नक्सलवाद के खिलाफ़ ठोस रोडमैप सामने है, तब यह सवाल उठना लाज़मी है कि तोमर बंधु पर कार्रवाई को लेकर सरकार खामोश क्यों है? अदालत से बार-बार आदेश आने के बावजूद भी गिरफ्तारी की दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे?
किसका संरक्षण?
इतिहास गवाह है कि नक्सलियों को कभी विचारधारा और राजनीतिक समर्थन मिला था। लेकिन आज जनता पूछ रही है—तोमर बंधु को किसका संरक्षण मिल रहा है? क्या उनकी पहुंच इतनी गहरी है कि कानून भी उन तक नहीं पहुँच पा रहा?
तोमर बंधु नक्सलियों से भी मज़बूत?
जनता के बीच यह चर्चा अब तेज़ है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में तोमर बंधु की ताक़त नक्सलियों से भी बड़ी हो चुकी है। अगर यह सच है तो यह स्थिति बेहद गंभीर है। क्योंकि सवाल सिर्फ़ कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि न्याय और लोकतंत्र की साख का है।
जनता का सवाल विजय शर्मा से
राज्य के गृह विभाग की ज़िम्मेदारी मंत्री विजय शर्मा के पास है। अब जनता सीधे उनसे पूछ रही है—
“तोमर बंधु पर कार्रवाई आखिर कब होगी? मार्च 2026 तक नक्सलवाद ख़त्म करने की तारीख़ तय है, तो तोमर बंधु की गिरफ्तारी की तारीख़ क्यों तय नहीं की जाती?”







