पांढुर्णा: परंपरा बनी पत्थरों की जंग
मध्यप्रदेश के पांढुर्णा में शनिवार को गोटमार मेले की परंपरा एक बार फिर हिंसा और पत्थरबाजी के बीच शुरू हुई। सुबह 10 बजे से जाम नदी पर पांढुर्णा और सावरगांव के लोग आमने-सामने आ गए। दोपहर 2.45 बजे तक करीब 337 लोग घायल हो चुके थे।
प्रशासन की तैयारी
घायलों के इलाज के लिए 6 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए हैं। मौके पर 600 पुलिस जवान, 58 डॉक्टर और 200 स्वास्थ्यकर्मी तैनात किए गए हैं। एहतियात के तौर पर कलेक्टर अजय देव शर्मा ने धारा 144 लागू कर दी है।
68 सालों में 13 मौतें
जानकारी के अनुसार 1955 से 2023 तक गोटमार मेले में पत्थरबाजी की वजह से अब तक 13 लोगों की जान जा चुकी है। कई लोग स्थायी रूप से घायल हुए—किसी ने आंख खोई तो किसी ने हाथ-पांव। बावजूद इसके, यह परंपरा हर साल और बड़े जोश के साथ निभाई जाती है। अपनों को खो चुके परिवार इसे शोक दिवस मानते हैं, जबकि बाकी लोग इसे परंपरा मानकर जारी रखते हैं।
गोटमार मेला कैसे होता है?
मेले की शुरुआत जाम नदी में चंडी माता की पूजा से होती है। इसके बाद सावरगांव के लोग नदी के बीच पलाश का पेड़ लगाते हैं और इसे अपनी “लड़की” मानकर रक्षा करते हैं। दूसरी ओर, पांढुर्णा के लोग पत्थरबाजी कर उस पेड़ और झंडे को कब्जे में लेने की कोशिश करते हैं। अंत में झंडा तोड़े जाने के बाद दोनों गांव मिलकर चंडी माता की पूजा करते हैं और मेला समाप्त होता है।







