बिज़नेस मीट के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक बयान इन दिनों चर्चा में है। उन्होंने कहा कि अगर किसी के पास शुरुआत करने के लिए कुछ भी नहीं है, तो वह मात्र ₹1000 से भी छोटा व्यवसाय खड़ा कर सकता है। ममता बनर्जी के मुताबिक, दो केतली खरीदकर घर पर चाय बनाई जा सकती है, साथ में बिस्कुट और छोले (घुघनी) जैसे नाश्ते रखकर रेलवे प्लेटफॉर्म या बस स्टैंड पर बिक्री शुरू की जा सकती है। उनके अनुसार, कुछ ही दिनों में इससे अच्छी कमाई संभव है।
मुख्यमंत्री के इस बयान को आत्मनिर्भरता और मेहनत आधारित रोज़गार से जोड़कर देखा जा रहा है। उनका इशारा इस ओर था कि छोटे स्तर के व्यवसायों में पूंजी से ज्यादा अहम भूमिका श्रम और निरंतरता की होती है। हालांकि, सियासी गलियारों में यह टिप्पणी तंज और व्यंग्य का विषय भी बन गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि यही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कही होती, तो गजब ही हो जाता। बावजूद इसके, यह तर्क सामने आ रहा है कि बार-बार सरकारी सहायता के नाम पर ₹2000 या ₹10000 की योजनाओं के सहारे ‘विकास’ के सपने बेचने के बजाय, आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐसे सुझाव ज्यादा व्यावहारिक माने जा सकते हैं।
यह बयान एक बार फिर उस बहस को हवा दे रहा है कि गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता तात्कालिक राहत योजनाओं में है या फिर छोटे, मेहनत आधारित व्यवसायों में।



