राहुल गांधी की राजनीति करने का अंदाज़ हमेशा सवाल खड़े करता है। वजह ये है कि वो भाषणबाज़ी से ज्यादा जनआंदोलन-आधारित राजनीति पर भरोसा करते नज़र आते हैं। इस रणनीति के दम पर कांग्रेस इस बार भले ही 99 सीटों तक पहुंच गई हो, लेकिन ये अभी भी बहुमत से बहुत दूर है।
अगर 2014 के दौर को याद करें, जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब का माहौल भी किसी जनांदोलन से कम नहीं था। यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हज़ारे का आंदोलन दिल्ली में गूंज रहा था और इसके समानांतर बीजेपी जनता के दिलों में जगह बना रही थी। 2014 के बाद बीजेपी की लगातार जीत को मीडिया ने “मोदी का विजय रथ” नाम दिया। साल दर साल ये रथ तेज़ी से आगे बढ़ता रहा और कांग्रेस लगातार पिछड़ती गई। हालांकि 2020 के बाद हालात बदलने लगे और एंटी-इनकंबेंसी का असर दिखने लगा, फिर भी चुनावी नतीजों में मोदी की जीत का सिलसिला जारी रहा।
कोविड महामारी के बाद हालात कुछ बदले। जनता अपनी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों से निराश होने लगी। इसी निराशा के बीच राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने लोगों का ध्यान खींचना शुरू किया। कांग्रेस को भी एहसास हुआ कि शायद अब समय आ गया है जब मोदी के विजय रथ को चुनौती दी जाए।
2025 के आते-आते छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि हार का कारण सिर्फ “मोदी फैक्टर” नहीं है, बल्कि कुछ और भी खेल चल रहा है। इस खोज में कांग्रेस को एक ऐसा मुद्दा मिला जिसे राजनीतिक “एटम बम” कहा जा सकता है—देश का चुनाव आयोग सवालों के घेरे में आ गया। पहली बार आज़ादी के 75 सालों में आयोग पर MISLEADING का ठप्पा लगा और उसके पास ठोस जवाब नहीं थे।
अब इस मसले का हल सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के रास्ते ही निकल सकता है। लेकिन राहुल गांधी को जनता पर बेहद भरोसा है। उन्हें लगता है कि जैसे 1977 में आपातकाल के बाद जनता ने उनकी दादी इंदिरा गांधी को लोकतंत्र का सबक सिखाया था, वैसे ही आज का भारत भी मोदी की राजनीति को उसकी हद दिखा सकता है—बशर्ते चुनाव आयोग वैसा ही निष्पक्ष और साहसी हो जैसा 1975 में था।
सवाल ये है कि क्या भरोसे वाली राजनीति का दौर अब भी ज़िंदा है? राहुल गांधी का विश्वास कायम है, लेकिन क्या जनता और सिस्टम भी उसी भरोसे पर खरे उतरेंगे?






