छत्तीसगढ़ सियासी संग्राम: मलमास बीतते ही बदल सकता है निजाम, ‘गुजरात फॉर्मूले’ से चौकेंगे सब

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों भीतर ही भीतर एक बड़ी हलचल महसूस की जा रही है। राजनीतिक गलियारों में तैरती खबरें और दिल्ली आलाकमान की कथित रणनीतियां इस बात की ओर इशारा कर रही हैं कि ‘मलमास’ (खरमास) की समाप्ति के बाद प्रदेश कैबिनेट और संगठन में एक बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है। कयास तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि केंद्रीय नेतृत्व छत्तीसगढ़ में भी अपनी उसी आक्रामक और चौंकाने वाली रणनीति को दोहरा सकता है, जिसे राजनीतिक हलकों में ‘गुजरात पैटर्न’ के नाम से जाना जाता है।

पिछले दो वर्षों के कार्यकाल का यदि निष्पक्ष आकलन किया जाए, तो जमीन पर कई तरह की चुनौतियां उभरकर सामने आई हैं। आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा आम है कि प्रदेश में नौकरशाही (Bureaucracy) और लालफीताशाही (Red-tapism) का प्रभाव इस कदर बढ़ गया है कि जनहित के फैसले फाइलों में दबे नजर आ रहे हैं।

प्रशासन पर कसी जाने वाली राजनीतिक पकड़ ढीली होने के कारण भ्रष्टाचार के आरोप भी सरकार की छवि को धूमिल कर रहे हैं। जब ब्यूरोक्रेट्स बेलगाम होने लगें, तो उसका सीधा खामियाजा जनता और सरकार के बीच के संवाद को भुगतना पड़ता है। दिल्ली हाई कमान के पास पहुंच रही ग्राउंड रिपोर्ट्स भी शायद इसी प्रशासनिक शिथिलता की ओर इशारा कर रही हैं, जिसने नेतृत्व को कड़े कदम उठाने पर मजबूर किया है।

इस पूरे घटनाक्रम में जो सबसे चौंकाने वाली और गंभीर चर्चा है, वह है पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह की सक्रिय राजनीति और शीर्ष पद पर संभावित वापसी। 15 वर्षों तक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह के पास प्रशासनिक अनुभव का वो विशाल भंडार है, जिसकी कमी वर्तमान में महसूस की जा रही है।

डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व के बीच एक बेहतरीन संतुलन था।
वे संगठन के सभी गुटों को साथ लेकर चलने और विपरीत परिस्थितियों में भी स्थिति को संभालने की क्षमता रखते हैं।
हाई कमान के एक धड़े का मानना है कि यदि प्रदेश को प्रशासनिक अराजकता से बाहर निकालना है और भ्रष्टाचार पर नकेल कसनी है, तो डॉ. रमन सिंह जैसे अनुभवी और सुलझे हुए चेहरे पर फिर से दांव लगाया जा सकता है।

दिल्ली आलाकमान इस समय एक बेहद बारीक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ जहां ‘गुजरात पैटर्न’ लागू कर पूरी कैबिनेट को रीफ्रेस करने का जोखिम है, वहीं दूसरी तरफ डॉ. रमन सिंह के रूप में एक आजमाए हुए और विश्वसनीय चेहरे पर भरोसा जताने का विकल्प है।

बदलाव केवल चेहरों का हो या पूरी व्यवस्था का, छत्तीसगढ़ की जनता इस समय एक ऐसी सरकार चाहती है जो पारदर्शी हो, जहां फाइलों के चक्कर में विकास न रुके और भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार हो। मलमास के बाद का समय केवल यह तय नहीं करेगा कि कैबिनेट में कौन रहेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आगामी चुनावों के लिए भाजपा का छत्तीसगढ़ में रोडमैप क्या होने वाला है। बदलाव की यह बयार यदि समय रहते सही दिशा में नहीं मोड़ी गई, तो प्रशासनिक शिथिलता का नुकसान आगामी राजनीतिक भविष्य पर भारी पड़ सकता है।

क्या है गुजरात पैटर्न?
जब केंद्रीय नेतृत्व बिना किसी पूर्व संकेत के पूरी की पूरी कैबिनेट या शीर्ष नेतृत्व को बदलकर नए चेहरों को कमान सौंप देता है, ताकि सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को कम किया जा सके और संगठन में नई ऊर्जा फूंकी जा सके।

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