जन आंदोलन की ताकत एक बार फिर सामने आई है। जनता से जुड़े मुद्दों को निरंतर उठाने और सरकार पर दबाव बनाने का परिणाम अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है।
प्रशांत किशोर के नेतृत्व में जनसुराज अभियान द्वारा लगातार चलाए गए जन-जागरण और संवाद के प्रभाव से सरकार को वृद्धावस्था पेंशन योजना पर पुनर्विचार करना पड़ा। नतीजतन, पहले जहां पात्र बुजुर्गों को 400 रुपये की मासिक सहायता मिलती थी, अब वह बढ़ाकर 1100 रुपये प्रति माह कर दी गई है।
शहरी नजर से देखें तो यह केवल 700 रुपये का अंतर है, लेकिन ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में रहने वाले बुजुर्गों के लिए यह एक बड़ा सहारा है। यह बदलाव उनके जीवन में सम्मान और आत्मनिर्भरता की भावना को मजबूत करता है।
जनसुराज के आलोचकों के लिए भी यह एक जवाब है। यदि बिना सत्ता में आए ही नीतिगत बदलाव शुरू हो सकते हैं, तो कल्पना कीजिए कि जब यह विचार शासन में आएगा, तब क्या कुछ संभव हो सकता है।
समाज परिवर्तन की इस प्रक्रिया में विश्वास बनाए रखिए। परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी है। नया बिहार अब सिर्फ सपना नहीं, दिशा बन चुका है।







