नई दिल्ली/रायपुर। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को दो महीने के भीतर भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण गठित करने का सख्त निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला अब और टालने योग्य नहीं है, और यदि तय समयसीमा में कार्रवाई नहीं हुई तो राज्य सरकार के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाएगी।
यह आदेश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने दिया। कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देशित किया है कि 2018 से लंबित इस मुद्दे का जल्द निराकरण करें। यह मामला सारंगढ़-बिलाईगढ़ निवासी बाबूलाल की ओर से वकील अभिनव श्रीवास्तव द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से सामने आया।
वर्षों से लटकी हैं मुआवजा व ब्याज से जुड़ी अर्जियां
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वर्ष 2018 में लागू नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत राज्य सरकार को संबंधित प्राधिकरण गठित करना था, ताकि प्रभावित किसान और भूमि स्वामी उचित मुआवजा और ब्याज प्राप्त कर सकें। लेकिन अब तक यह गठन नहीं हो पाया है, जिससे सैकड़ों मामले अनसुलझे पड़े हैं और पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।
राज्य सरकार ने बताया कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपर्याप्त मानते हुए सख्त रूख अपनाया।
हाईकोर्ट ने याचिका को बताया था ‘गैर-जनहित’
इससे पूर्व, इसी मुद्दे पर दायर जनहित याचिका को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनहित का मामला मानने से इनकार करते हुए खारिज कर दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर चिंता का विषय मानते हुए हस्तक्षेप किया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया – अधिकार रहेंगे सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश के बावजूद याचिकाकर्ता या अन्य प्रभावित लोग अपने मुआवजे या ब्याज के हक से वंचित नहीं होंगे। उनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर 2025 को होगी, जिसमें यह जांचा जाएगा कि राज्य सरकार ने निर्देशों का पालन किया या नहीं।







