रायपुर। पूर्ववर्ती भूपेश सरकार के समय वर्ष 2021-22 में मनाए गए बोरे बासी महोत्सव को लेकर सरकारी फिजूलखर्ची पर सवाल उठने लगे हैं। यह मुद्दा विधानसभा में विधायक धर्मजीत सिंह ने उठाया, जिसके बाद श्रम मंत्री लखन लाल देवांगन ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए।
मंत्री के अनुसार, यह आयोजन करीब 50,000 से अधिक श्रमिकों के लिए किया गया था। लेकिन यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि जहां एक थाली भोजन सामान्यतः ₹100 में उपलब्ध है, वहीं इस कार्यक्रम में सरकार ने प्रति व्यक्ति ₹1795 खर्च कर डाले। यानी 18 गुना अधिक भुगतान किया गया। इस आयोजन पर कुल खर्च 8.97 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है।
परिवहन में भी उड़ाए लाखों
श्रमिकों को आयोजन स्थलों तक लाने-ले जाने के लिए विभाग ने करीब 48 लाख रुपये परिवहन पर खर्च किए। कार्यक्रम में रायपुर के मजदूरों को लाने में ही 13 लाख रुपए खर्च किए गए जबकि दूर के इलाके बस्तर से 46 हजार और सरगुजा से मजदूरों को लाने में 65,000 ही खर्च हुए।
अब तक कोई कार्रवाई नहीं
इस मामले में सामने आए खर्च और संभावित घोटाले को लेकर अब तक किसी भी अधिकारी या एजेंसी पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया है। मंत्री ने यह जरूर स्वीकार किया कि यह योजना अनियोजित और अनावश्यक खर्च के साथ लागू की गई थी, लेकिन जवाबदेही तय नहीं हो सकी है।
आंकड़े खुद कर रहे हैं घोटाले की गवाही
सरकारी कार्यक्रम में हुए खर्चों की जब जांच की गई, तो खुद आंकड़ों ने ही फिजूलखर्ची और संभावित घोटाले की कहानी बयां कर दी। आइए नज़र डालते हैं उन खर्चों पर जो सवाल खड़े करते हैं:
- श्रमिकों का आवागमन:16,000 श्रमिकों को बसों और छोटे वाहनों से लाने में 9.65 लाख रुपये खर्च हुए।
- कैप (टोपी) खरीद:40,000 कैप 205 रुपये प्रति पीस की दर से खरीदी गईं। कुल खर्च: 82 लाख रुपये।
- ब्रॉशर छपाई:30,000 ब्रॉशर 80 रुपये प्रति ब्रॉशर की दर से छपवाए गए। कुल भुगतान: 24 लाख रुपये।
- वाटर जार व्यवस्था:2,500 वाटर जार लगाने में 75,000 रुपये खर्च किए गए।
- कुर्सियों की व्यवस्था:35,000 कुर्सियाँ 7 रुपये प्रति कुर्सी की दर से लगाई गईं। कुल खर्च: 2.61 लाख रुपये।
- भोजन व्यवस्था:50,000 लोगों को भोजन परोसा गया, 150 रुपये प्रति थाली की दर से। कुल खर्च: 75 लाख रुपये।
- पानी की बोतलें: 1.5 लाख पानी की बोतलें 18 रुपये प्रति बोतल में खरीदी गईं। कुल खर्च: 27 लाख रुपये।
- छाछ वितरण:70,000 लोगों को 18 रुपये प्रति ग्लास की दर से छाछ पिलाई गई। कुल खर्च: 12.6 लाख रुपये।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि जहां बाज़ार में इन वस्तुओं और सेवाओं की वास्तविक कीमतें काफी कम हैं, वहीं सरकारी खर्च कई गुना ज्यादा दिखाया गया है। ऐसे में यह पूरा मामला सिर्फ फिजूलखर्ची नहीं, बल्कि एक संभावित घोटाले की ओर इशारा करता है।
क्या है बोरे बासी?
छत्तीसगढ़ का पारंपरिक भोजन “बोरे बासी” गर्मी के मौसम में खाया जाता है, जिसमें रात के बचे चावल को पानी में भिगोकर सुबह दही, प्याज, मिर्च के साथ खाया जाता है। यह भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है।
श्रमिकों पर खर्च करने की बजाय सरकारी धन का करोड़ो रूपये की फिजूलखर्ची सरकार पर सवाल खड़े करता है ।






