वडोदरा (गुजरात)।महिसागर नदी पर बना करीब 40 साल पुराना पुल बुधवार को टूट गया, जिसमें 15 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। यह हादसा केवल एक संरचनात्मक विफलता नहीं बल्कि प्रशासनिक अनदेखी का भी उदाहरण बन गया है। अब एक सामाजिक कार्यकर्ता ने सनसनीखेज दावा किया है कि पुल की खस्ताहाली को लेकर तीन साल पहले ही सरकार को आगाह किया गया था।
2022 की चेतावनी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं
‘युवा सेना’ संस्था के सामाजिक कार्यकर्ता लखन दरबार ने अगस्त 2022 में सड़क एवं भवन विभाग के एक अधिकारी से मुलाकात कर पुल की खतरनाक स्थिति की जानकारी दी थी। बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग अब वायरल हो रही है, जिसमें अधिकारी खुद मानते हैं कि “यह पुल ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगा।”
सरकारी रिपोर्ट भी कर चुकी थी पुष्टि
ऑडियो में अधिकारी बताते हैं कि एक निजी कंसल्टेंसी द्वारा कराए गए सर्वे में भी यही निष्कर्ष निकला था कि पुल असुरक्षित है। लेकिन विभाग ने केवल प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजा और पुल को चालू ही रखा गया।
प्रमुख संपर्क पुल बना मौत का रास्ता
यह पुल वडोदरा और आनंद जिलों को जोड़ता था और प्रतिदिन हजारों लोग इसका उपयोग करते थे। हादसे के समय पुल पर कई वाहन थे, जो नदी में गिर गए। रेस्क्यू टीमें अब भी लापता लोगों की तलाश में जुटी हैं।
प्रशासनिक चुप्पी पर उठे सवाल
लखन दरबार ने आरोप लगाया कि पुल की खतरनाक हालत की जानकारी होते हुए भी उसे बंद नहीं किया गया। उन्होंने पूछा कि क्या प्रशासन ने जानबूझकर खतरे को नजरअंदाज किया या यह सिर्फ फाइलों तक सीमित कार्रवाई थी?
विभाग ने दी सफाई, लेकिन सवाल कायम
सड़क एवं भवन विभाग के कार्यकारी इंजीनियर नैनिश नायकवाला ने सफाई दी कि पुल का निरीक्षण किया गया था और कोई बड़ी तकनीकी खामी नहीं पाई गई। उन्होंने बताया कि बीयरिंग कोट में समस्या थी, जिसे ठीक कर दिया गया था।
लगातार हादसों के बावजूद नहीं चेता प्रशासन
गुजरात में पिछले तीन वर्षों में 16 से अधिक पुल दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। 2022 में मोरबी में 135 लोगों की मौत, 2023 में तापी व सुरेंद्रनगर पुल हादसे, और अब यह त्रासदी – यह सभी घटनाएं एक पैटर्न की ओर इशारा करती हैं कि राज्य सरकार पुलों की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं है।
कांग्रेस का तीखा वार, SIT की मांग
कांग्रेस ने इस हादसे के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के इस्तीफे की मांग की है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि यह हादसा प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता का उदाहरण है। कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने कहा कि राज्य में जान की कीमत केवल 4 लाख रुपए रह गई है और हादसों के बाद केवल मुआवजा देने की राजनीति बची है।







