जब देश में टीवी स्क्रीन पर हिंदू-मुस्लिम, जात-पात और पड़ोसी देशों से जुड़ी बहसें छाई रहती हैं, तब असली मुद्दे अक्सर हाशिए पर चले जाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों के सवाल शायद ही मुख्यधारा की चर्चा का हिस्सा बन पाते हैं। देश का पेट भरने वाले किसान आज खुद भूखे मरने को मजबूर हैं। महाराष्ट्र सरकार द्वारा हाल ही में पेश किए गए आंकड़े इस दर्दनाक सच्चाई को उजागर करते हैं।
जनवरी से मार्च 2025 के बीच, सिर्फ तीन महीनों में 767 किसानों ने आत्महत्या कर ली। इनमें सबसे अधिक मामले विदर्भ क्षेत्र से सामने आए हैं। महाराष्ट्र विधानसभा में कांग्रेस विधायकों के सवालों के जवाब में राज्य के राहत और पुनर्वास मंत्री मकरंद पाटिल ने यह जानकारी दी।
इनमें से 376 मामलों में परिजनों को ₹1 लाख की सहायता दी गई, जबकि 200 मामलों में मापदंड अधूरे होने के कारण मदद नहीं दी गई। बाकी 194 मामलों की अभी जांच चल रही है।
यवतमाल, अमरावती, अकोला, बुलढाणा और वाशिम जिलों से 257 किसानों ने आत्महत्या की, लेकिन सिर्फ 76 परिवारों को मदद दी गई।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2024 में 2635 किसान, और 2023 में 2851 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। ये आंकड़े सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
कांग्रेस पार्टी और वरिष्ठ पत्रकारों ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस वादे को याद दिलाया जिसमें उन्होंने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही थी। कांग्रेस ने कहा कि “किसानों की आय दोगुनी तो नहीं हुई, पर आयु जरूर आधी हो गई।”







