पूर्वोत्तर के दिग्गज गायक और सांस्कृतिक प्रतीक जूबिन गर्ग को विदाई देने लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। असम की गलियों से लेकर गुवाहाटी की सड़कों तक, पूरा इलाका एक समंदर में तब्दील हो गया। लेकिन सवाल यह है कि इतने बड़े जनसैलाब के बावजूद राष्ट्रीय चैनल कहाँ थे?
टीवी स्क्रीन पर वही घिसी-पिटी बहसें, वही बेतुकी चीख-चिल्लाहट, वही “टीआरपी प्रवक्ता”— मानो देश की धड़कन सिर्फ सत्ता की बयानबाज़ी और बॉलीवुड की चमक-दमक से चलती हो।
जूबिन गर्ग: पूर्वोत्तर की आत्मा, पर “नेशनल मीडिया” के लिए गुमनाम
जूबिन गर्ग कोई साधारण गायक नहीं थे। वे असम और पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान थे। उनके गानों में असमिया समाज की आत्मा बसती थी। लाखों लोगों का सड़कों पर उमड़ना बताता है कि वे इस क्षेत्र के लिए “सुपरस्टार से कहीं बढ़कर” थे।
लेकिन दिल्ली-मुंबई के चैनलों के लिए यह सब “लोकल इवेंट” से ज़्यादा अहमियत नहीं रखता।
असली चेहरा बेनक़ाब
“नेशनल मीडिया” बार-बार अपने चेहरे से नक़ाब गिराता है।
पूर्वोत्तर में बाढ़ आए, आदिवासी इलाकों में संघर्ष हो, या फिर किसी स्थानीय हीरो के लिए लाखों लोग उमड़ें— यह सब TRP की नज़र से महत्वहीन है।
वही मीडिया किसी फिल्म स्टार की पार्टी, किसी क्रिकेटर के अफेयर या किसी नेता के उटपटांग बयान पर घंटे भर का प्राइमटाइम चलाता है।
सवाल साफ है
क्या “भारत” सिर्फ दिल्ली और मुंबई तक सीमित है?
क्या पूर्वोत्तर, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, केरल, या अन्य राज्यों की भावनाएँ और संस्कृतियाँ “नेशनल” नहीं मानी जाएँगी?
जूबिन गर्ग के जनसैलाब ने इस सवाल को और गहरा कर दिया है।
अगर लाखों लोगों का दुख, आंसू और प्रेम “नेशनल खबर” नहीं है, तो फिर नेशनल कहलाने का हक़ ही क्यों?



