छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का अपनी जनगणना खुद करने की घोषणा

Madhya Bharat Desk
2 Min Read

भारत में जातिगत जनगणना की घोषणा के बीच छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज ने केंद्र सरकार की पहल से पहले ही अपनी स्वतंत्र सामाजिक जनगणना की शुरुआत कर दी है।

जहां एक ओर केंद्र ने कांग्रेस की जाति आधारित जनगणना की मांग को स्वीकारते हुए देशभर में जातिगत आंकड़े इकट्ठा करने की तैयारी शुरू की है, वहीं छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय ने खुद की सामाजिक गणना कर ऐतिहासिक पहल की है।

सर्व आदिवासी समाज द्वारा बस्तर संभाग में प्रारंभ की गई इस जनगणना में समुदाय के लोग खुद हिस्सा ले रहे हैं। जनगणना का मकसद केवल जनसंख्या आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शिक्षा, रोजगार, जमीन की स्थिति, सरकारी योजनाओं की पहुँच और पलायन जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है।

2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में आदिवासी जनसंख्या 78 लाख से अधिक थी, लेकिन उसके बाद जनगणना नहीं हो सकी। अब, सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम जैसे नेताओं ने इस जनगणना को सामुदायिक जागरूकता का प्रतीक बताया है।

युवा नेता लक्ष्मीनाथ कश्यप के अनुसार, हर गांव में 2% आदिवासी युवा स्वयंसेवक बनकर जनगणना का कार्य कर रहे हैं और लगभग 50% कार्य पूर्ण हो चुका है। कुल 17 श्रेणियों में आंकड़े दर्ज किए जा रहे हैं, जिसमें शिक्षा, गोत्र, पारंपरिक धर्म, पलायन की स्थिति जैसे बिंदु शामिल हैं।

राजनीतिक समर्थन भी इस पहल को मिला है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि यह प्रयास आदिवासी समाज की आत्मनिर्भरता का परिचायक है और जाति जनगणना में संभावित हेराफेरी से बचाव में सहायक होगा।

हालांकि, कुछ आदिवासी समुदाय जैसे हल्बा और भत्रा के समावेश को लेकर भ्रम की स्थिति है, लेकिन सर्व आदिवासी समाज का कहना है कि आगे चलकर इन सभी को भी उचित श्रेणी में शामिल किया जाएगा।

यह पहल सरकार की मान्यता पाए या नहीं, लेकिन सामाजिक स्तर पर इसकी प्रमाणिकता और उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता।

Share on WhatsApp

Share This Article
Leave a Comment