“प्रकाशन से पहले मंजूरी जरूरी या नहीं? नरणवे की पुस्तक को लेकर सरकार, सेना और पेंगुइन आमने-सामने

Madhya Bharat Desk
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देश में एक बार फिर राष्ट्र सुरक्षा, नियमों की समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यह सवाल सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह से किए जा रहे हैं। विवाद की जड़ 2021 में संशोधित Central Civil Services (Pension) Rules हैं, जिनके तहत इंटेलिजेंस और सुरक्षा से जुड़े संगठनों जैसे IB, RAW और कुछ अर्धसैनिक बलों से रिटायर अधिकारियों पर यह सख्त शर्त लागू है कि वे अपनी पूर्व संस्था से जुड़ा कोई भी लेख, किताब या अन्य प्रकाशन वर्तमान प्रमुख की अनुमति के बिना नहीं कर सकते। नियम के उल्लंघन की स्थिति में पेंशन तक प्रभावित की जा सकती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि यही नियम सेना से रिटायर होने वाले अधिकारियों पर क्यों लागू नहीं होते। पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरणवे की प्रस्तावित पुस्तक Four Stars of Destiny को लेकर यही बहस अब तेज हो गई है। यह पूछा जा रहा है कि क्या जनरल नरणवे ने अपनी पुस्तक को प्रकाशक को सौंपने से पहले वर्तमान सेना प्रमुख या रक्षा मंत्रालय से समीक्षा और मंजूरी के लिए भेजा था। अगर नहीं, तो क्या यह नियमों के दोहरे मानदंड को नहीं दर्शाता?

विवाद का दूसरा बड़ा पहलू पुस्तक के कथित कंटेंट लीक को लेकर है। सवाल यह भी है कि पुस्तक की सामग्री आखिर लीक किसने की—क्या यह खुद जनरल नरणवे की ओर से हुआ या फिर प्रकाशक की ओर से लापरवाही बरती गई। इसी बीच पुस्तक के प्रकाशक पेंगुइन इंडिया ने बयान जारी कर कहा है कि Four Stars of Destiny न तो प्रकाशित हुई है और न ही प्रिंट या डिजिटल रूप में इसकी कोई प्रति सार्वजनिक की गई है।

हालांकि, इस बयान के बाद मामला और उलझ गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी जिस पुस्तक को सार्वजनिक मंचों पर दिखाते नजर आए, वह आखिर कौन-सी किताब थी? यदि पेंगुइन का दावा सही है कि किताब न छपी और न रिलीज हुई, तो फिर वह प्रति कहां से आई। वहीं दूसरी ओर यह दावा भी सामने आया है कि अमेज़न पर यह पुस्तक उपलब्ध थी और इसकी बिक्री भी हुई, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि पेंगुइन से दबाव में बयान दिलवाया गया है।

पूरे घटनाक्रम ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। एक तरफ सरकार की चुप्पी है, दूसरी तरफ प्रकाशक के विरोधाभासी दावे और विपक्ष के तीखे सवाल। यह विवाद अब सिर्फ एक किताब तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि नियमों की समानता, सेना और सिविल सेवाओं के लिए अलग-अलग मापदंड और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह मामला और गहराने की संभावना जताई जा रही है।

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