एपस्टीन कनेक्शन विवाद: हरदीप पुरी की बेटी के मानहानि केस में हाईकोर्ट पहुँची चुनौती

Madhya Bharat Desk
3 Min Read

दिल्ली में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानहानि कानून के बीच टकराव देखने को मिल रहा है। रायपुर के सोशल एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की बेटी हिमायनी पुरी से जुड़े मानहानि मामले में जारी रोक आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

यह मामला उन सोशल मीडिया पोस्ट्स से जुड़ा है, जिनमें हिमायनी पुरी का नाम अमेरिकी फाइनेंसर जेफरी एपस्टिन के साथ जोड़ा गया था। इन पोस्ट्स को लेकर कोर्ट ने पहले ही हटाने का आदेश दिया था, जिसे अब चुनौती दी गई है।

 क्या है पूरा मामला?

हिमायनी पुरी ने 10 करोड़ रुपये का मानहानि मुकदमा दायर करते हुए आरोप लगाया कि उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है। उनका कहना है कि झूठी और भ्रामक जानकारी के जरिए उनकी छवि खराब की जा रही है।

17 मार्च 2026 को जस्टिस मिनी पुष्करना की एकल पीठ ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए X (पूर्व ट्विटर), गूगल, यूट्यूब, मेटा और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म्स को निर्देश दिया था कि भारत के भीतर इस तरह की सामग्री को हटाया जाए। हालांकि, कोर्ट ने वैश्विक स्तर पर कंटेंट हटाने के फैसले को फिलहाल टाल दिया।

 एक्टिविस्ट का पक्ष

कुणाल शुक्ला का कहना है कि यह आदेश एकतरफा “गैग ऑर्डर” जैसा है, जिसे बिना उनकी बात सुने जारी कर दिया गया। उनका दावा है कि उन्होंने जो भी सामग्री साझा की, वह सार्वजनिक दस्तावेजों जैसे अमेरिकी SEC फाइलिंग्स और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स पर आधारित है।

उन्होंने दलील दी कि जब कोई सामग्री सार्वजनिक रिकॉर्ड पर आधारित हो और उसमें सत्यता या निष्पक्ष टिप्पणी का पहलू हो, तो मुकदमे से पहले उस पर रोक लगाना उचित नहीं है।

शुक्ला के अनुसार, यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा का नहीं बल्कि बड़े सार्वजनिक हित से जुड़ा है, जिसमें प्रभावशाली लोगों के वित्तीय संबंधों की जांच शामिल है।

 संवैधानिक सवाल भी उठे

अपील में यह भी कहा गया है कि यह आदेश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर “पूर्व-प्रतिबंध” (Pre-censorship) जैसा है। इससे खोजी पत्रकारिता पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

 मुकदमे में कौन-कौन?

इस मामले में कई पत्रकार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, कुछ सरकारी अधिकारी और अन्य अज्ञात पक्षकार शामिल हैं। हिमायनी पुरी का दावा है कि विवादित सामग्री अब भी ऑनलाइन मौजूद है और लगातार उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही है।

 क्यों अहम है यह मामला?

यह केस भारत में डिजिटल कंटेंट, फ्री स्पीच और मानहानि कानून के बीच संतुलन तय करने का बड़ा उदाहरण बन सकता है खासतौर पर तब, जब मामला सार्वजनिक दस्तावेजों और हाई-प्रोफाइल नामों से जुड़ा हो।

Share on WhatsApp

Share This Article
Leave a Comment