पटना: बिहार विधानसभा चुनाव (2025) की घोषणा के साथ ही एक बार फिर राज्य की राजनीति का पुराना और कड़वा सच सामने आ गया है। जहाँ एक ओर सभी प्रमुख पार्टियाँ ‘गुंडई-मुक्त’ और ‘साफ सियासत’ की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट देने का चलन बदस्तूर जारी है।
राजनीतिक शुचिता के तमाम नारों के बावजूद, ऐसा लगता है कि बिहार की चुनावी रणभूमि में ‘बाहुबल’ अब भी एक ‘जीत की गारंटी’ माना जाता है।
दानापुर: जेल से चुनावी मैदान तक – रीतलाल यादव का मामला
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इस बार भी दानापुर विधानसभा क्षेत्र से रीतलाल यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है, जो इस समय जेल में हैं।
- आपराधिक रिकॉर्ड: रीतलाल यादव पर हत्या, रंगदारी, वसूली, धमकी और अवैध कब्जे जैसे 11 गंभीर मामले दर्ज हैं।
- वर्तमान स्थिति: वह अप्रैल 2025 से जेल में बंद हैं, उन पर दो ठेकेदारों से रंगदारी मांगने का आरोप है।
- पार्टी का समर्थन: सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उनकी गैरमौजूदगी में राजद के शीर्ष नेता – लालू यादव, मीसा भारती और तेजस्वी यादव – स्वयं उनके लिए वोट मांग रहे हैं।
यह स्थिति जनता के बीच गंभीर सवाल खड़े कर रही है:
“जब बाहुबली उम्मीदवार के समर्थन में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खड़ा है, तो फिर ‘स्वच्छ राजनीति’ के वादे पर कैसे यकीन किया जाए? फिर फर्क क्या रह गया ललन बाबू (जेडीयू) और लालू बाबू (राजद) के ‘शुचिता’ के दावों में?”
लालगंज: बाहुबली की विरासत और नए तेवर
लालगंज से भी बाहुबली राजनीति की विरासत को आगे बढ़ाने का स्पष्ट संकेत मिला है।
- राजद का दांव: राजद ने यहाँ से शिवानी शुक्ला को टिकट दिया है, जो हत्या के मामले में सजायाफ्ता मुन्ना शुक्ला की बेटी हैं।
- बेबाक बयान: जब एक पत्रकार ने शिवानी से पूछा कि क्या बाहुबली राजनीति की विरासत अब भी जारी है, तो उनका जवाब बेहद तीखा था: “मैं एक बाहुबली की बेटी हूं, सवाल वही होंगे जो हम चाहेंगे।” यह बयान स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि बिहार में बाहुबली नेताओं के परिवार सत्ता और राजनीति में अपनी पकड़ छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
सवाल बड़ा है: ‘सफाई’ के वादे क्यों होते हैं बेअसर?
बिहार की राजनीति में यह लगभग हर चुनाव की कहानी है। नेता मंच से ‘गुंडई-मुक्त’ बिहार का नारा लगाते हैं, मगर टिकट वितरण के समय उनकी याददाश्त कमजोर पड़ जाती है। कारण स्पष्ट है—
- बाहुबली अक्सर अपने क्षेत्र में एक मजबूत वोट बैंक और निजी तंत्र रखते हैं, जिससे उनका जीतना सुनिश्चित माना जाता है।
- पार्टियाँ सैद्धांतिक शुद्धता के बजाय ‘जीत की क्षमता’ (Winnability) को प्राथमिकता देती हैं, भले ही इसके लिए अपराध को गले लगाना पड़े।
कभी जनता बाहुबली नेताओं को ‘अपने हक की आवाज़’ मानती थी, लेकिन अब वही राजनीति धमकी, केस और समझौते की जमीन पर खड़ी दिखती है।
अफसोस बस इतना है:
“इस सड़ चुकी सियासत में ही बिहार को इस बार भी एक सरकार चुननी होगी, जहाँ ‘साफ सियासत’ बस एक चुनावी जुमला बनकर रह गया है।”







