छत्तीसगढ़ में शिक्षाकर्मियों की पदोन्नति (क्रमोन्नति) और वेतनमान को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर लगातार सुनवाई जारी है, जिसमें सोमवार 3 नवंबर से शुरू हुई बहस मंगलवार को भी देर शाम तक चली। न्यायमूर्ति एन.के. व्यास की सिंगल बेंच इस मामले में अब गुरुवार को अगली सुनवाई करेगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने छह प्रमुख सवाल चिन्हित किए हैं, जिनके उत्तरों पर शिक्षाकर्मियों की वरिष्ठता, ग्रेडेशन सूची और प्रमोशन की स्थिति निर्भर करेगी। इन सवालों में यह भी शामिल है कि क्या शिक्षाकर्मी अपने अस्तित्व काल में “सरकारी कर्मचारी” की परिभाषा में आते थे या नहीं, तथा क्या पंचायत कर्मियों को राज्य कर्मी माना जा सकता है। इसके अलावा अदालत ने यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि 10 मार्च 2017 के शासनादेश का प्रभाव पूर्व शिक्षाकर्मियों पर किस प्रकार लागू होगा।
मामले में WPS 3369/2021 और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के प्रभाव को लेकर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई। न्यायालय ने यह जानना चाहा कि क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा SLP खारिज करते समय छोड़े गए खुले बिंदुओं (open points) पर अब पुनः विचार किया जा सकता है। यदि ऐसा संभव है, तो सिंगल बेंच इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा कर सकती है।
इस मामले की विशेषता यह है कि यह छत्तीसगढ़ के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा केस माना जा रहा है, जिसमें एक साथ 1020 याचिकाओं की सुनवाई हो रही है। सभी याचिकाएं शिक्षाकर्मियों द्वारा सोनिया साहू केस के आधार पर दायर की गई हैं, जिसमें उन्होंने अपनी वरिष्ठता और ग्रेडेशन सूची में सुधार की मांग की है।
हाईकोर्ट ने इस जटिल मामले को एक साथ सुनने का निर्णय लिया है और प्रतिदिन सुनवाई जारी रखने का आदेश दिया है। अदालत का मानना है कि इन छह सवालों के जवाब मिलने के बाद शिक्षाकर्मियों की पदोन्नति और वेतनमान से जुड़ी अस्पष्टताएं समाप्त हो जाएंगी और भविष्य की दिशा स्पष्ट होगी।
इस पूरे प्रकरण पर शिक्षाकर्मियों की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि निर्णय आने के बाद न केवल उनकी वरिष्ठता सूची में बदलाव संभव है, बल्कि राज्य सरकार की नीतियों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।






