पटना। बिहार के बैंकों से वर्ष 1990 से लेकर पिछले साल तक 26 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि दूसरे राज्यों में हस्तांतरित होने का चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। यह आंकड़ा राज्य की आर्थिक स्थिति और पूंजी के बहिर्गमन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस बड़े वित्तीय हस्तांतरण के बीच, राज्य में स्थानीय मुद्दों पर चल रही बहस भी सामने आई है। महरौड़ा के एक मिल के लिए चल रहा विवाद और चक्का की फैक्ट्री से रोजगार के वादे, ये सभी स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन की चुनौतियों को उजागर करते हैं।

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने इस वित्तीय पलायन के पीछे की एक प्रमुख वजह बताई है। उनका कहना है कि बिहार से पूंजी का यह लगातार बहिर्गमन राज्य की आर्थिक रीढ़ को कमजोर कर रहा है और स्थानीय स्तर पर नए उद्योगों और रोजगार के अवसरों के निर्माण में बाधा डाल रहा है। किशोर ने इस स्थिति को बिहार के समग्र विकास के लिए एक बड़ी चुनौती करार दिया है, जिस पर तत्काल ध्यान देने और ठोस आर्थिक नीतियों को लागू करने की आवश्यकता है।
यह मुद्दा अब राजनीतिक और आर्थिक दोनों गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है, और इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर बहस जारी है।







