कांकेर, केसालपारा
जहां एक ओर सरकारें “विकास” के बड़े-बड़े दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर कांकेर जिले के केसालपारा गांव के बच्चे आज भी जान जोखिम में डालकर शिक्षा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांव के पास बहता नाला आज भी पुल का इंतजार कर रहा है। रोज़ बच्चे कमर तक बहते पानी में बैग सिर पर रखकर नाले को पार करते हैं और कानागांव स्थित स्कूल पहुंचते हैं।
बरसात का डर, पढ़ाई से दूरी
बरसात के मौसम में स्थिति और खराब हो जाती है – कभी तेज बहाव बच्चों को स्कूल से रोक देता है, तो कभी उनका बैग और किताबें भीग जाती हैं। प्राथमिक विद्यालय गांव में है, लेकिन माध्यमिक शिक्षा के लिए बच्चों को रोज़ नाला पार करना मजबूरी बन चुका है।
वादा तो मिला, पुल नहीं
ग्रामीण वर्षों से पुल की मांग कर रहे हैं। जनप्रतिनिधि चुनाव के समय वादों की झड़ी लगाते हैं, लेकिन नाले पर पुल अब तक अधूरा सपना बना हुआ है। जिला पंचायत सदस्य भी अपनी बात कई बार रख चुके हैं, मगर प्रशासन की उदासीनता अब लोगों के सब्र का इम्तिहान ले रही है।
क्या यही है ‘विकास’ का असली चेहरा?
सवाल बड़ा है – जब एक छोटे से पुल के लिए इतने सालों से आवाज़ उठाने के बावजूद कुछ नहीं हुआ, तो क्या हम सच में विकास की राह पर हैं? ये केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस खामोशी की तस्वीर है जो ग्रामीण भारत के बच्चों की भविष्य से खिलवाड़ कर रही है।







