रणनीतिकार एक दिन राहुल गांधी को ही ले डूबेंगे!

Madhya Bharat Desk
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नई दिल्ली/इंदौर।राहुल गांधी के सलाहकार और रणनीतिकार एक दिन राहुल गांधी को ले डूबेंगे। यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि एक तरफ दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI चारों केंद्रीय पदों में से एक भी पद नहीं जीत सकी, वहीं दूसरी ओर इंदौर में आयोजित राहुल के कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री के करते हुए एक बुजुर्ग महिला पर आलोचना किया गया। जहां छात्रों के मुद्दों पर चर्चा होनी थी, वहां बुजुर्ग महिला पर  अपमानजक व्यंग्य कर कार्यक्रम का उद्देश्य ही उलट गया।

‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री करते हुए “मां को कुर्सी दो” और “सेटिंग” जैसे बात कहा। कार्यक्रम में मिमिक्री करते हुए राहुल गांधी से गले भी मिला। आखिर छात्रों के मुद्दों पर बात करने वाले इस कार्यक्रम में मिमिक्री करने वाले व्यक्ति की क्या जरूरत थी। इसको लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आने लगी है कि “एक मानवताविहीन व्यक्ति के लिए मां को सम्मान देना एक सेटिंग लगता है। ऐसे नीच व्यक्ति को राहुल गांधी अपने गले लगाता है।”

सवाल यह नहीं है कि किसी राजनीतिक नेता की मिमिक्री होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि छात्रों के बीच आयोजित राहुल गांधी के कार्यक्रम में एक बुजुर्ग महिला को लेकर ऐसा व्यंग्य करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?

आरोप लगाए जा रहे है कि कांग्रेस पार्टी की निर्मम हो चुकी राजनीति को ममत्व, संवेदना और सेवा से कोई लेना देना ही नहीं है। सत्ता की राजनीति में डूबी कांग्रेस जनसेवा की उस भावना से कोसों दूर हो चुकी है, जिसमें समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति करुणा और संवेदनशीलता सर्वोपरि होती है।

राजनीतिक आलोचना के लिए मुद्दों की कोई कमी नहीं है। बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था, फीस, भर्ती परीक्षाएं और युवाओं के रोजगार जैसे दर्जनों मुद्दे छात्रों के सामने हैं। ऐसे में किसी बुजुर्ग महिला से जुड़े प्रसंग को हास्य का हिस्सा बनाना क्या राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान का संदेश मजबूत करता है।

यहीं ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर सवाल खड़ा होता है कि क्या राहुल गांधी के सलाहकार और रणनीतिकार यह समझ पा रहे हैं कि उनके कार्यक्रम का संदेश छात्रों तक किस रूप में पहुंच रहा है?

DUSU में NSUI का खाता तक नहीं खुला

इसी बीच दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव का परिणाम कांग्रेस की छात्र राजनीति के लिए बड़ा सवाल लेकर आया है। DUSU के चार केंद्रीय पदों में NSUI एक भी पद नहीं जीत सकी।

अध्यक्ष पद पर ABVP के यश डबास ने NSUI के विजय शंकर मीणा को हराया। ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव—तीन केंद्रीय पदों पर जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने जीता। इस तरह चार केंद्रीय पदों में NSUI का खाता नहीं खुला।

यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि NSUI को कांग्रेस के छात्र संगठन के रूप में राहुल गांधी की युवा राजनीति के महत्वपूर्ण हिस्से के तौर पर देखा जाता है।

कन्हैया कुमार की रणनीति पर सवाल

इस चुनाव की तैयारियों में कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार की भूमिका की चर्चा हो रही है। राहुल गांधी ने भरोसा कर छात्रा संघ के लिए कन्हैया को रणनीतिकार का जिम्मा सौंपा था।

सबसे बड़ा सवाल उम्मीदवार चयन को लेकर है। जिस दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल की, वह पहले NSUI से जुड़े रहे थे। यानी जिस संगठन से जुड़े उम्मीदवार को टिकट नहीं मिला, उसी से जुड़े एक बागी उम्मीदवार ने निर्दलीय मैदान में उतरकर जीत हासिल कर ली।

DUSU चुनाव के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस का वोट चोरी, SIR को लेकर आरोप लगाना, EVM हैक सभी आरोप धरी की धरी रह गई। पूरे वोटर्स जेन जी ही थे।

चुनाव परिणाम यह रहा है कि चार केंद्रीय पदों में से तीन ABVP ने जीते और एक निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गया।

यहीं से राहुल गांधी की राजनीति और उनके सलाहकारों की रणनीति को लेकर बड़ा सवाल पैदा होता है क्या सिर्फ नैरेटिव बनाने से छात्र राजनीति जीती जा सकती है?

रागिनी नायक का बयान भी याद आया

कांग्रेस नेता रागिनी नायक का चुनाव को लेकर यह बयान अक्सर चर्चा में रहता है कि “चुनाव जुबानजोरी से नहीं, रणनीति और मेहनत से जीते जाते हैं।” DUSU चुनाव के परिणाम के बाद यही बात कांग्रेस और NSUI की मौजूदा स्थिति पर लागू होती हुई दिखाई देती है।

राहुल गांधी के सामने रणनीति का सवाल

एक तरफ राहुल गांधी छात्रों के बीच जाकर ‘सिस्टम’, रोजगार, शिक्षा और युवाओं के भविष्य की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ उनकी पार्टी का छात्र संगठन DUSU के चार केंद्रीय पदों में एक भी पद नहीं जीत पाया।

एक तरफ ‘छात्रों की गूंज’ में युवाओं से संवाद का दावा है, दूसरी तरफ उसी कार्यक्रम में बुजुर्ग महिला पर आलोचना किया जा रहा है।

Video Source / Credit – POLITICAL KIDA.

इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो सवाल राहुल गांधी से ज्यादा उनके सलाहकारों और रणनीतिकारों से पूछा जाना चाहिए कि क्या वे राहुल गांधी की राजनीति को जमीन से जोड़ रहे हैं या सिर्फ सोशल मीडिया के लिए कंटेंट तैयार कर रहे हैं?

क्योंकि DUSU का परिणाम और ‘छात्रों की गूंज’ का विवाद—दोनों मिलकर कांग्रेस की युवा राजनीति के सामने एक ही सवाल खड़ा करते हैं: रणनीति आखिर किसके लिए और किस दिशा में बनाई जा रही है?

अगर रणनीति छात्रों को जोड़ने के बजाय उन्हें राजनीतिक तमाशे का दर्शक बना दे, और उम्मीदवार चयन ऐसा हो कि संगठन के अपने ही पुराने चेहरे निर्दलीय होकर जीत जाएं, तो फिर सलाहकारों और रणनीतिकारों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

राहुल गांधी को विरोधियों से जितना खतरा नहीं, उससे कहीं बड़ा सवाल उनकी अपनी रणनीति और सलाहकारों की दिशा का है। कहीं ऐसा न हो कि राहुल को आगे बढ़ाने की कोशिश में यही रणनीतिकार एक दिन राहुल गांधी को ही ले डूबें।

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