नागेन्द्र पाण्डेय, संपादक
देश की राजनीति तेजी से बदल रही है। सत्ता के गलियारों में अब सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों की चर्चा नहीं, बल्कि Gen Z के गुस्से और सवालों की भी गूंज सुनाई देने लगी है। यह वह पीढ़ी है जो अपनी मूलभूत जरूरतों, रोजगार, शिक्षा, अवसर और बेहतर भविष्य की मांग को लेकर जगह-जगह सड़कों पर उतर रही है। युवा जब सवाल लेकर सड़क पर आता है तो उसे केवल विरोध समझना राजनीतिक भूल हो सकती है। यह असंतोष आने वाले चुनावों में जनमत का संकेत भी बन सकता है।
आज सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों के नेताओं के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी है। वजह साफ है—युवा अब सिर्फ भाषण सुनने के मूड में नहीं है, वह जवाब चाहता है। राजनीति की विडंबना यह है कि जो नेता एक राज्य में विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं, वही किसी दूसरे राज्य में सत्ता का हिस्सा हैं। ऐसे में युवाओं के सवाल किसी एक दल तक सीमित नहीं रहने वाले। चुनावी मैदान में उतरने वाले हर राजनीतिक दल और हर उम्मीदवार को अपने काम, वादों और नीतियों का हिसाब देना होगा।
आने वाले छह महीनों में सात राज्यों के चुनाव राजनीतिक माहौल को और गरमाने वाले हैं। ऐसे समय में युवाओं की नाराजगी को हल्के में लेना किसी भी राजनीतिक दल के लिए महंगा पड़ सकता है। नेता चुनावी दौरे पर निकलेंगे, सभाएं करेंगे, रोड शो करेंगे और वोट मांगेंगे। लेकिन अगर उसी रास्ते पर बेरोजगारी, शिक्षा, महंगाई, अवसर और भविष्य को लेकर सवाल पूछता युवा खड़ा हो गया, तो राजनीतिक भाषणों की चमक फीकी पड़ सकती है।
कैनवासिंग के दौरान अगर Gen Z नेताओं को घेरकर सवाल पूछने लगी, तो जवाब देना आसान नहीं होगा। जिन नेताओं के काफिले आज सुरक्षा घेरे में आराम से निकलते हैं, उन्हें कल उसी युवा के सवालों का सामना करना पड़ सकता है, जिसे वे चुनाव के समय सिर्फ वोटर समझते हैं। सवाल जब लगातार और सीधे होंगे तो राजनीतिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर भी सामने आएगा।
आज का युवा सोशल मीडिया पर सवाल पूछता है, सड़क पर सवाल पूछता है और राजनीतिक नेताओं से सीधे जवाब मांगता है। उसे सिर्फ भावनात्मक नारों से लंबे समय तक संतुष्ट करना आसान नहीं है। राजनीतिक दलों के लिए संदेश साफ है—युवाओं को सुनना होगा, उनकी समस्याओं पर बात करनी होगी और सवालों के जवाब देने होंगे।
सत्ता की चाबी सिर्फ चुनावी रणनीति से नहीं, जनता के भरोसे से मिलती है। और उस भरोसे में युवा वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। अगर युवाओं को लगातार नजरअंदाज किया गया तो चुनावी मैदान में इसका असर दिखाई देना तय है।
आज Gen Z सड़क पर सवाल पूछ रही है। कल वही सवाल वोट की कतार में जवाब मांग सकते हैं। इसलिए राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए वक्त रहते इस आवाज को सुन लेना बेहतर है। क्योंकि सत्ता के दरवाजे पर खड़ी नई पीढ़ी की दस्तक को नजरअंदाज करना आसान हो सकता है, लेकिन उसके राजनीतिक परिणामों से बचना शायद उतना आसान नहीं होगा।





