मई 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की कमान संभाली, तभी से भारत के खेल जगत में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। खेलों को बढ़ावा देने और भारत को खेल महाशक्ति बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने कई योजनाएं शुरू कीं। योग को वैश्विक पहचान दिलाना भी इसी सोच का हिस्सा रहा। प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में योग को दुनियाभर में अपनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे 14 दिसंबर 2014 को मंजूरी मिली। इसके बाद 21 जून 2015 से हर साल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है। आज संयुक्त राष्ट्र के लगभग सभी 193 सदस्य देशों में योग दिवस आयोजित होता है। भारत सरकार ने योगासन को खेल का दर्जा भी दिया है, जो देश के लिए गर्व की बात है।
प्रधानमंत्री मोदी का लक्ष्य केवल योग तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने ओलंपिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत की पदक संख्या बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया। इसी सोच के तहत खेलो इंडिया मिशन शुरू किया गया, जिसके माध्यम से गांवों और शहरों से प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान कर उन्हें बेहतर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अंडर-18, अंडर-20 और अंडर-21 आयु वर्ग के उभरते खिलाड़ियों को केंद्र सरकार के खर्च पर विदेशों में प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के लिए भेजा जा रहा है, ताकि वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों से मुकाबला कर सकें।
इस पहल का मकसद केवल जीत-हार नहीं, बल्कि खिलाड़ियों को नई तकनीक, नई रणनीति और अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव देना है। इससे युवा खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ता है और उनमें यह विश्वास पैदा होता है कि मेहनत के दम पर वे भारत का तिरंगा पूरी दुनिया में लहरा सकते हैं।
लेकिन दूसरी ओर छत्तीसगढ़ से ऐसी बातें सामने आ रही हैं, जो चिंता बढ़ाने वाली हैं। आरोप है कि राज्य सरकार ने खिलाड़ियों के हित में जो नियम बनाए हैं, उनका पालन ही सही तरीके से नहीं हो रहा। उत्कृष्ट खिलाड़ियों की चयन प्रक्रिया और उनकी घोषणा में लगातार देरी हो रही है, जिससे सैकड़ों खिलाड़ियों का भविष्य अधर में लटक गया है।
खेलों में करियर बनाने वाला हर खिलाड़ी और उसका परिवार एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य का सपना देखता है। खासकर ओलंपिक और कोर ग्रुप के खेलों में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ी वर्षों तक कठिन मेहनत करते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसे हजारों खिलाड़ी हैं, जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवारों से आते हैं।
कई खिलाड़ियों के माता-पिता दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करते हैं। कोई ऑटो-रिक्शा चलाता है, कोई कुली का काम करता है, तो कोई ठेला लगाकर फल, गुपचुप, आलू टिक्की, मोमोज, इडली, डोसा या चाय बेचकर परिवार चलाता है। इसके बावजूद वे अपने बच्चों के लिए महंगे जूते, मोजे, ट्रैक सूट, गेंद और दूसरी खेल सामग्री खरीदने के लिए कर्ज तक लेते हैं, ताकि उनका बच्चा खेल में आगे बढ़ सके।
दुर्भाग्य की बात यह है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुके कई खिलाड़ी आज भी आर्थिक तंगी और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। उत्कृष्ट खिलाड़ियों की समय पर घोषणा नहीं होने के कारण उन्हें सरकारी सुविधाओं, नौकरी और अन्य लाभों से वंचित रहना पड़ रहा है। कई खिलाड़ियों की खेलने की उम्र ही निकल गई, लेकिन उन्हें उनका अधिकार नहीं मिल सका।
पिछले दस वर्षों में प्रदेश में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें आईं और गईं, लेकिन खेल विभाग के प्रशासनिक अधिकारी वही रहे। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि खिलाड़ियों के लिए बनी योजनाओं का लाभ समय पर क्यों नहीं मिला? खिलाड़ियों के हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही क्यों हुई? यदि समय पर उत्कृष्ट खिलाड़ियों की घोषणा होती, तो कई खिलाड़ियों का भविष्य आज अलग हो सकता था।
चर्चा यह भी है कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण प्रदेश के सैकड़ों बच्चे, किशोर और युवा खेलों से दूर होते जा रहे हैं। जिन अभिभावकों ने उधार लेकर अपने बच्चों को खेलों में आगे बढ़ाया, वे भी अब निराश होकर बच्चों को खेलों में भेजने से हिचकिचा रहे हैं। इससे प्रदेश में खेल संस्कृति पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों का कहना है कि यदि छत्तीसगढ़ सरकार वास्तव में खिलाड़ियों के हितों के प्रति गंभीर है, तो उत्कृष्ट खिलाड़ियों की चयन प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता और समयबद्ध तरीके से पूरी की जाए। पात्र खिलाड़ियों को उनका अधिकार, सम्मान और सुविधाएं समय पर मिलें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह केवल खिलाड़ियों के भविष्य के साथ अन्याय नहीं होगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस सोच और खेल नीति पर भी सवाल खड़े होंगे, जिसका उद्देश्य भारत को खेलों की महाशक्ति बनाना है।





