DPDP कानून से पत्रकारिता पर असर? सुप्रीम कोर्ट पहुंचा 21 न्यूज पब्लिशर्स का मामला

Madhya Bharat Desk
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नई दिल्ली। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 और इससे जुड़े नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की है। अदालत ने कहा है कि नागरिकों की निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। अदालत ने कानून के चुनौती वाले प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग पर फिलहाल कोई आदेश नहीं दिया है।

पत्रकारिता के लिए छूट नहीं होने पर सवाल

DNPA का मुख्य तर्क है कि DPDP कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं दी गई है। एसोसिएशन का कहना है कि इससे संपादक, रिपोर्टर और न्यूज पब्लिशर्स को निजी डेटा के इस्तेमाल से पहले सूचना देने, सहमति लेने और डेटा मिटाने जैसी शर्तों का पालन करना पड़ सकता है।

याचिका में कहा गया है कि खोजी पत्रकारिता में अक्सर भ्रष्टाचार, सार्वजनिक अनियमितता या दुर्भावनापूर्ण कार्यों की जांच के लिए निजी जानकारी की जरूरत पड़ती है। ऐसे में अगर संबंधित व्यक्ति से पहले सहमति लेनी हो, तो उसे जांच की जानकारी मिल सकती है और सबूत नष्ट होने या प्रभाव डालने का खतरा पैदा हो सकता है।

खबरें हटाने और सूत्रों पर खतरे की आशंका

DNPA ने आशंका जताई है कि डेटा मिटाने या सहमति वापस लेने की मांग के जरिए प्रकाशित खबरों को हटवाने का दबाव बन सकता है। एसोसिएशन के अनुसार, यह स्थिति संपादकीय स्वतंत्रता और प्रेस के सामान्य कामकाज के लिए चुनौती पैदा कर सकती है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि सरकारी संस्थाओं को डेटा से जुड़ी जानकारी मांगने की शक्ति से पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती है। DNPA ने इन शक्तियों में आवश्यकता, अनुपात और न्यायिक निगरानी से जुड़े पर्याप्त सुरक्षा उपाय न होने पर भी सवाल उठाए हैं।

RTI में बदलाव को भी चुनौती

DNPA ने DPDP एक्ट की धारा 44(3) को भी चुनौती दी है, जिसने सूचना का अधिकार कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया है। याचिका के मुताबिक, इस बदलाव से व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक हित में जानकारी माना जाने से रोका जा सकता है, जिससे RTI के दायरे पर असर पड़ सकता है।

एसोसिएशन ने यह भी तर्क दिया है कि कानून में शोध, संग्रह और सांख्यिकीय कार्यों को छूट दी गई है, लेकिन जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को ऐसी छूट नहीं दी गई। DNPA ने इसे मनमाना वर्गीकरण बताया है।

21 न्यूज पब्लिशर्स की याचिका

DNPA में 21 डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स शामिल हैं। इनमें Network18, NDTV, The Indian Express और Times Internet जैसे संगठनों के डिजिटल प्लेटफॉर्म शामिल बताए गए हैं।

याचिका में DPDP एक्ट की कई धाराओं और DPDP नियमों के कुछ प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 19(1)(a) के विपरीत बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है। एसोसिएशन का कहना है कि ये प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार को अनुचित रूप से सीमित करते हैं।

अगली सुनवाई 17 नवंबर को

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को तय की है। इस दिन यह याचिका अन्य लंबित याचिकाओं के साथ सुनी जाएगी।

अभी अदालत ने केवल केंद्र से जवाब मांगा है; कानून की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। केंद्र के जवाब के बाद यह मामला पत्रकारिता, नागरिक निजता और डिजिटल खबरों के प्रकाशन के अधिकार के बीच संतुलन तय करने के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

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