रायपुर जिले के तिल्दा क्षेत्र में स्थित 117 वर्ष पुराने पेंद्रावन जलाशय के कैचमेंट क्षेत्र में खनन की अनुमति को लेकर अब प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा सवाल उठ रहा है। किसान संगठनों और ग्रामीणों का आरोप है कि जल संसाधन विभाग के अधिकारी बिना व्यापक जनसुनवाई और बांध सुरक्षा के व्यापक अध्ययन के कंपनी के पक्ष में प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं।
विभागीय रिपोर्ट को नजरअंदाज?
पेंद्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति का आरोप है कि जल संसाधन विभाग की अपनी रिपोर्ट में ही इस जलाशय को सिंचाई, मछली पालन, निस्तारी और भूमिगत जल रिचार्ज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। इसके बावजूद अधिकारियों द्वारा खनन के पक्ष में एनओसी की प्रक्रिया तेज करने से यह सवाल उठ रहा है कि विभाग अपनी ही तकनीकी रिपोर्ट को क्यों दरकिनार कर रहा है।
पेंद्रावन जलाशय तिल्दा क्षेत्र के दर्जनभर गांवों के लिए सिंचाई और पेयजल का प्रमुख स्रोत है। संगठनों के अनुसार यह जलाशय हजारों किसानों की खेती, मछली पालन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ा है। ऐसे में कैचमेंट क्षेत्र में खनन से जल संचयन क्षमता, बांध की सुरक्षा और भूमिगत जल स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
डेम सेफ्टी बोर्ड की चेतावनी भी अनसुनी?
आरोप है कि राज्य के डेम सेफ्टी बोर्ड ने पहले ही स्पष्ट किया था कि इस क्षेत्र में खनन से पेंद्रावन जलाशय का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। किसान समिति का कहना है कि इस तकनीकी चेतावनी के बाद भी अधिकारी कंपनी द्वारा कराए गए सीमित अध्ययन को आधार बनाकर निर्णय की दिशा में बढ़ रहे हैं, जो प्रशासनिक सावधानी के बजाय लापरवाही के संकेत देता है।
हाईकोर्ट आदेश की आड़ में कार्रवाई?
25 अप्रैल 2024 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग को कंपनी को सुनवाई का अवसर देकर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था। ग्रामीणों का आरोप है कि इस आदेश की आड़ में विभाग ने पारदर्शी जनसुनवाई और स्वतंत्र जल-सुरक्षा अध्ययन के बिना ही खनन के पक्ष में
पहले भी रद्द हुई थी एनओसी
पेंद्रावन जलाशय के कैचमेंट में खनन को लेकर पहले भी विवाद हो चुका है। वर्ष 2015-17 के दौरान किसानों के विरोध और विधानसभा में उठे सवालों के बाद जल संसाधन विभाग ने कंपनी को दी गई एनओसी रद्द की थी। तत्कालीन विभागीय स्तर पर भी स्वीकार किया गया था कि खनन से जलाशय की सिंचाई क्षमता और कैचमेंट क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
इस कार्रवाई के बाद आसपास के गांवों के किसान और ग्रामीण एक बार फिर आंदोलन की तैयारी में हैं। पेंद्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया है कि यदि खनन की अनुमति वापस नहीं ली गई तो दर्जनभर गांवों के लोग जलाशय बचाने के लिए एकजुट होंगे।
मामला अब केवल खनन और पर्यावरण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का बन गया है। सवाल यह है कि जब जलाशय की रक्षा के लिए विभागीय रिपोर्ट, डेम सेफ्टी बोर्ड की चेतावनी और हजारों किसानों का विरोध मौजूद है, तो अधिकारी किसके निर्देश पर और किस हित में निर्णय की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं। ग्रामीणों की मांग है कि सरकार तत्काल हस्तक्षेप कर खनन अनुमति की प्रक्रिया रोके और जिम्मेदार अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगे।






