रायपुर।हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ हुई कथित शिकायत की जांच के लिए राजभवन (लोकभवन) द्वारा गठित जांच समिति अपनी प्रक्रिया और निष्पक्षता को लेकर विवादों में घिर गई है। पहली ही नजर में यह पूरी कार्रवाई एकतरफा और पूर्वाग्रह से प्रेरित प्रतीत होती है। जिस तरह से नियमों को दरकिनार कर इस समिति की रूपरेखा तैयार की गई है, उससे प्रशासनिक हलकों और विधि विशेषज्ञों के बीच राजभवन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं।
नियोक्ता ही सदस्य और कर्मचारी अध्यक्ष
गठित जांच समिति के ढांचे में गंभीर प्रशासनिक विसंगति देखने को मिल रही है। समिति का अध्यक्ष छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के अध्यक्ष प्रो. वी. के. गोयल को बनाया गया है, जबकि राज्यपाल के सचिव सी. आर. प्रसन्ना इसमें बतौर सदस्य शामिल हैं। गौरतलब है कि विनियामक आयोग के अध्यक्ष पद पर प्रो. गोयल की नियुक्ति स्वयं राज्यपाल के सचिव के हस्ताक्षरों से हुई है।
विधि विशेषज्ञों की स्पष्ट राय है कि यह स्थिति प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के पूर्णतः विपरीत है। जब समिति का अध्यक्ष अपने ही नियोक्ता अधिकारी के साथ बैठकर जांच की अध्यक्षता करेगा, तो उस पर अपने वरिष्ठ का प्रत्यक्ष दबाव रहेगा। ऐसे दबावपूर्ण माहौल में न तो जांच निष्पक्ष हो सकती है और न ही इसके निष्कर्ष प्रभावमुक्त रह सकते हैं।
विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के प्रावधानों का उल्लंघन
जांच समिति का गठन छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 में निहित वैधानिक प्रावधानों के भी सीधे खिलाफ है:
- प्रो. वी. के. गोयल अपने पूरे करियर में कभी भी किसी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर आसीन नहीं रहे हैं। अधिनियम के नियमों के अनुसार, जो व्यक्ति स्वयं कभी कुलपति न रहा हो, वह किसी पदस्थ कुलपति के खिलाफ जांच का नेतृत्व नहीं कर सकता।
- समिति में उपसचिव स्तर की अधिकारी निधि साहू को सदस्य बनाया गया है। प्रशासनिक नियमों और पदानुक्रम (Hierarchy) के तहत उपसचिव स्तर का अधिकारी किसी विश्वविद्यालय के पदस्थ कुलपति की जांच नहीं कर सकता। यह कदम पूरी तरह से गैर-कानूनी और अवैधानिक है।
कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप की साजिश और राजभवन से सांठगांठ
सूत्रों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, कुलपति इस पूरे मामले में पूरी तरह से निर्दोष और क्लीनचिट हैं। उन्हें एक सोची-समझी रणनीति के तहत निशाना बनाया जा रहा है। इस पूरी गढ़ी गई कहानी और विवादित जांच समिति के गठन के पीछे विश्वविद्यालय के कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप की मुख्य भूमिका बताई जा रही है।
आरोप हैं कि कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप ने लोकभवन के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों के साथ साठगांठ करके इस पूरी एकतरफा कार्रवाई का ताना-बाना बुना है। अपने प्रशासनिक प्रभावों का गलत इस्तेमाल करते हुए नियमों को ताक पर रखकर ऐसी समिति बनवाई गई, ताकि कुलपति पर अनुचित दबाव बनाया जा सके।






