एजेंडा चलाने वाले अखबार द इंडियन एक्सप्रेस ने 22 सितंबर के अपने संस्करण में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बदनाम करने की कोशिश की। लेकिन महज चार दिन बाद, 26 सितंबर के संस्करण में अखबार को अपने ही नैरेटिव पर सफाई देनी पड़ी।
अखबार के ‘एक्सप्लेन्ड’ सेक्शन में दामिनी नाथ ने एक लेख लिखकर बताया कि 1993 में चुनाव आयोग के तीन सदस्यीय निकाय बनने के बाद से आयुक्तों के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं। हालांकि, चर्चा के जरिए मामलों को सुलझाना और सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करना आयोग की सामान्य प्रक्रिया रही है।
दामिनी नाथ ने अपने लेख में टी.एन. शेषन, एन. गोपालस्वामी, अशोक लवासा और अन्य आयुक्तों के कार्यकाल के उदाहरण दिए। इन उदाहरणों के जरिए यह बताने का प्रयास किया गया कि आयोग के भीतर मतभेद होना कोई नई बात नहीं है और ऐसे मतभेद पहले भी कभी-कभी सार्वजनिक होते रहे हैं।
लेख में यह भी स्पष्ट किया गया कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े सभी प्रस्तावों को तीनों चुनाव आयुक्तों के हस्ताक्षर के साथ सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई थी। यानी जिस मुद्दे को लेकर विवाद खड़ा किया गया, उसी पर बाद में अखबार के स्पष्टीकरण ने कई सवालों को कमजोर कर दिया।
यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि 22 सितंबर को चुनाव आयोग पर सवाल उठाने वाला लेख लिखने वाली रितिका चोपड़ा ने इससे पहले चुनाव आयोग से जुड़ी खबरों को नियमित रूप से कवर नहीं किया था। दूसरी ओर, स्पष्टीकरण देने वाला लेख दामिनी नाथ ने लिखा, जो चुनाव आयोग को नियमित रूप से कवर करने वाली रिपोर्टर हैं।
पूरे घटनाक्रम से यह सवाल उठता है कि क्या द इंडियन एक्सप्रेस ने पहले जानबूझकर एजेंडा-प्रेरित लेख प्रकाशित किया और बाद में बढ़ती प्रतिक्रिया से बचने के लिए स्पष्टीकरण जारी किया?
अब सवाल यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को गाली देने और चुनाव आयोग पर आरोप लगाने वाले लोग क्या माफी मांगेंगे? क्या इस पूरे मामले में अखबार और उसके जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू होगी?






