नई दिल्ली/रायपुर। नेशनल हेराल्ड को लेकर प्रदेश की राजनीति में एक नया विरोधाभास चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ केंद्र में मोदी सरकार इस मामले में कानूनी कार्रवाई और जांच की प्रक्रिया चला रही है, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय सरकार के कार्यकाल में राज्य के जनसंपर्क विभाग द्वारा उसी प्रकाशन को करोड़ों रुपये के सरकारी विज्ञापन दिए गए हैं।
इसी विरोधाभास को लेकर अब जनमानस और राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे हैं कि जब केंद्र सरकार इस मामले को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है, तो राज्य में उसी अखबार को सरकारी विज्ञापन क्यों दिए जा रहे हैं।
विधानसभा में उठा मुद्दा
यह मुद्दा छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी गूंजा। भाजपा विधायक सुशांत शुक्ला ने सवाल उठाते हुए पूछा कि वर्ष 2019-20 से 2025-26 के बीच राज्य के जनसंपर्क विभाग ने नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन मद में कितनी राशि दी।
सरकार की ओर से दिए गए जवाब के अनुसार इस अवधि में नेशनल हेराल्ड को निम्नलिखित राशि विज्ञापन के रूप में जारी की गई—
- 2019-20 : 34 लाख रुपये
- 2020-21 : 58 लाख रुपये
- 2021-22 : 68 लाख रुपये
- 2022-23 : 1.28 करोड़ रुपये
- 2023-24 : 1.36 करोड़ रुपये
“राजनीतिक दल के प्रकाशन को सरकारी विज्ञापन?”
सदन में इस मुद्दे को लेकर पूरक प्रश्न भी पूछे गए। विधायकों ने सवाल उठाया कि क्या किसी राजनीतिक दल से जुड़े प्रकाशन या उसके विचारों के मुखपत्र को सरकारी धन से विज्ञापन देना उचित है।
भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने भी सरकार से पूछा कि आखिर किस नीति के तहत यह विज्ञापन दिए गए और क्या इसकी जांच कराई जाएगी।
सरकार का जवाब
मुख्यमंत्री ने जवाब देते हुए कहा कि सभी विज्ञापन विज्ञापन नियमावली 2019 के तहत दिए गए हैं और भुगतान प्रति पृष्ठ 8 लाख रुपये की दर से किया गया।
इस पूरे मामले के बाद अब यह सवाल राजनीतिक मंचों के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर केंद्र सरकार नेशनल हेराल्ड मामले को लेकर सख्ती दिखा रही है, वहीं राज्य में उसी प्रकाशन को सरकारी विज्ञापन मिलने से केंद्र और राज्य की नीतियों के बीच विरोधाभास की चर्चा तेज हो गई है।



