1.20 करोड़ के प्रस्ताव के बाद भी पुल नहीं बना! ग्रामीणों ने खुद बनाया रास्ता

Madhya Bharat Desk
4 Min Read

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में साढ़े तीन साल पहले भी गांव वालों ने इसी तरह का अस्थायी पुल बनाया था, जिसे प्रशासन ने तुड़वा दिया था। उस समय पक्के पुल के लिए करीब 1.20 करोड़ रुपये का प्रस्ताव बनाए जाने की बात कही गई थी। पैसे जारी होने और प्रस्ताव बनने के बावजूद पुल का निर्माण जमीन पर नहीं उतर सका।

इस आरामखोरी वाली व्यवस्था में किसी की जिम्मेदारी तय नहीं होती, इसलिए सबकुछ चलता रहता है। नतीजा यह है कि जिन ग्रामीणों को पक्के पुल की सुविधा मिलनी चाहिए थी, उन्हें आज भी बारिश के मौसम में अपने स्तर पर रास्ता तैयार करना पड़ रहा है।

मामला सहसपुर लोहारा ब्लॉक की गोरखपुर खुर्द पंचायत का है। यहां कर्रा नाला पर पक्के पुल की मांग लंबे समय से पूरी नहीं होने के बाद ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से करीब 25 फीट लंबा अस्थायी पुल तैयार कर लिया। बताया गया कि गांव के करीब 800 ग्रामीणों के आवागमन के लिए यह रास्ता बेहद महत्वपूर्ण है।

ग्रामीणों ने चेकडैम के कंक्रीट पिलरों को आधार बनाकर अस्थायी ढांचा तैयार किया है। बारिश के दौरान नाला उफान पर आने से गांव का संपर्क प्रभावित हो जाता है। ऐसे में ग्रामीणों ने प्रशासन की ओर देखने के बजाय खुद ही संसाधन जुटाए और पुल खड़ा कर दिया।

साढ़े तीन साल पहले भी बना था अस्थायी पुल

ग्रामीणों के मुताबिक करीब साढ़े तीन साल पहले भी उन्होंने इसी जगह अस्थायी पुल बनाया था। उस समय प्रशासन ने इसे तुड़वा दिया था। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इसके बाद पक्के पुल का निर्माण होगा। करीब 1.20 करोड़ रुपये का प्रस्ताव बनाए जाने की बात भी सामने आई थी, लेकिन लंबे समय बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ।

अब हालात फिर वही हैं। पक्के पुल का इंतजार करते-करते ग्रामीणों ने दोबारा अपने पैसे और श्रम से अस्थायी पुल तैयार कर लिया है।

छह पिलरों पर टिका ढांचा, हर कदम पर जोखिम

ग्रामीणों द्वारा बनाया गया यह अस्थायी ढांचा छह पिलरों पर टिका हुआ है। पुल से रोजाना ग्रामीणों का आवागमन हो रहा है, लेकिन इसकी मजबूती और सुरक्षा को लेकर खतरा बना हुआ है। बारिश के मौसम में नाले का जलस्तर बढ़ने पर यह अस्थायी व्यवस्था और भी जोखिम भरी हो सकती है।

ग्रामीणों का कहना है कि कई बार पक्के पुल की मांग की गई, लेकिन उनकी गुहार पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार मजबूरी में उन्हें खुद ही रास्ता बनाना पड़ा।

ग्रामीणों की यह पहल केवल एक पुल बनाने की कहानी नहीं, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था पर सवाल भी है, जहां प्रस्ताव बनते हैं, बजट की बातें होती हैं, लेकिन जमीन पर काम नहीं पहुंचता। साढ़े तीन साल बाद भी अगर ग्रामीणों को अपने आवागमन के लिए खुद पुल बनाना पड़े, तो सवाल यही है कि पक्के पुल के लिए जिम्मेदार कौन है और जवाबदेही कब तय होगी?

Share on WhatsApp

Share This Article
Leave a Comment