बालोद। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी और परिवहन व्यवस्था की पारदर्शिता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बालोद जिले में वर्षों से चल रहे धान परिवहन के खेल की कड़ियाँ अब खुलकर सामने आने लगी हैं। गुंडरदेही ब्लॉक के कोड़ेवा धान खरीदी केंद्र से 13 जनवरी को करीब 900 बोरी धान लेकर निकला ट्रक चार दिन तक लापता रहा, जबकि शासन की गाइडलाइन के अनुसार पूरे परिवहन तंत्र की निगरानी GPS सिस्टम से की जानी थी।
बताया जा रहा है कि बालोद जिले में दमन ट्रांसपोर्ट पिछले चार-पांच वर्षों से परिवहन कार्य कर रहा है। जिले में आएदिन धान की कमी और गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आती रही हैं। हाल ही में जगतरा, धोबनपुरी और फुंडा संग्रहण केंद्रों में धान शॉर्टेज का मामला उजागर हुआ था, जिसमें एक अन्य ठेकेदार से जुड़े राइस मिल कारोबार की भूमिका भी सामने आई थी।
सूत्रों के अनुसार परिवहन कार्य में लगे ठेकेदारों की व्यवसायिक पृष्ठभूमि और आपसी संबंधों की विभागीय स्तर पर गंभीरता से जांच नहीं की गई। यही नहीं, फड़ों में हमाली और भूसा ढुलाई जैसे कार्य भी लंबे समय से एक ही परिवहनकर्ता द्वारा फर्म का नाम बदल-बदल कर किए जा रहे हैं, जो अपने आप में एक बड़े जांच का विषय है। बताया जा रहा है कि इन ठेकेदारों की विभाग में गहरी पकड़ है।

चार दिन बाद यह ट्रक बालोद-कांकेर जिले की सीमा से लगे बढ़भूम दमकसा गांव के पास घने जंगल में सड़क किनारे लावारिस हालत में मिला। हैरानी की बात यह रही कि न तो परिवहन ठेकेदार ने ट्रक के गायब होने की सूचना समय पर दी और न ही संबंधित विभाग ने कोई अलर्ट जारी किया। यदि ग्रामीण जंगल में खड़े ट्रक को नहीं देखते, तो यह मामला शायद सामने ही नहीं आता।

ग्रामीणों की सूचना पर देर रात प्रशासनिक टीम मौके पर पहुंची, जिसके बाद इलाके में भारी आक्रोश देखा गया। लोगों ने सवाल उठाया कि जब GPS जैसी आधुनिक निगरानी व्यवस्था मौजूद है, तो धान से भरा ट्रक चार दिन तक कैसे गायब रहा।
मामले को लेकर जिला विपणन अधिकारी टिकेंद्र राठौर ने जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होने की बात कही, लेकिन GPS सिस्टम के निष्क्रिय रहने और जिम्मेदारों की लापरवाही पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया।

यह घटना सिर्फ एक ट्रक के लापता होने का मामला नहीं, बल्कि पूरी धान खरीदी और परिवहन व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर करती है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और परिवहन ठेकेदारों पर कार्रवाई होगी या यह भी अन्य मामलों की तरह जांच के नाम पर फाइलों में दबा दिया जाएगा।
धान खरीदी जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में इस तरह की लापरवाही न केवल किसानों के भरोसे को तोड़ती है, बल्कि सरकारी व्यवस्था की साख पर भी गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।



