रायपुर। केंद्र की मोदी सरकार और राज्य के साय सरकार ने मिलकर हसदेव अरण्य को अडानी के हाथों दे दिया है। राजस्थान में बिजली की पर्याप्त पूर्ति हो रही है बावजूद इसके जबरन लोगों के विरोध को कुचलकर समृद्ध जंगल को बर्बाद करते हुए खदान खोली जा रही है। आधे से ज्यादा कोयला अडानी के तिल्दा, रायगढ़ और मध्यप्रदेश स्थित पावर प्लांटों में खपाया जा रहा है। किसी जांच एजेंसी में दम नहीं है कि इस हजारों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करे।
हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और पर्यावरणीय सवाल तेज हो गए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, हसदेव अरण्य क्षेत्र के केंटे एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को राजस्थान के बिजली संयंत्रों के लिए आवंटित किया गया है। इस परियोजना को लेकर पर्यावरणीय मंजूरियों और वनभूमि के डायवर्जन का मामला भी सामने आया है। परियोजना से प्राप्त कोयले का उपयोग राजस्थान के ताप विद्युत संयंत्रों में किया जाना प्रस्तावित है।
लेकिन इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या राजस्थान की बिजली जरूरत पूरी करने के लिए हसदेव अरण्य के जंगल में नई खदान खोलना जरूरी है?
राजस्थान में सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता लगातार बढ़ रही है। वहीं, ग्रिड में उपलब्ध बिजली को पूरी तरह समायोजित करने के लिए ट्रांसमिशन और स्टोरेज क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता भी सामने आती रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सौर ऊर्जा से बिजली उपलब्ध है, तो उसका अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त ट्रांसमिशन और स्टोरेज व्यवस्था क्यों नहीं विकसित की जा रही?
यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ सूरज से बिजली पैदा हो रही है और दूसरी तरफ ग्रिड की सीमाओं के कारण उस बिजली में कटौती करनी पड़ रही है। ऐसे में फिर यह कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य के जंगलों को काटकर कोयला निकाला जाए।
राजस्थान को बिजली चाहिए, इसमें कोई विवाद नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि राजस्थान को कितनी बिजली चाहिए और उसके लिए कितने कोयले की वास्तविक जरूरत है?
क्या राजस्थान की मौजूदा कैप्टिव कोयला खदानों से पर्याप्त कोयला मिल सकता है? पुराने ताप विद्युत संयंत्रों के बंद होने के बाद कोयले की जरूरत कितनी रह जाएगी? हजारों मेगावाट सौर और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जुड़ने के बाद कोयले पर निर्भरता कितनी बचेगी? भविष्य में परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ने के बाद तस्वीर क्या होगी? और यदि ट्रांसमिशन तथा स्टोरेज क्षमता में सुधार किया जाता है, तो अतिरिक्त ताप विद्युत की जरूरत कितनी रह जाएगी?
इन सभी सवालों का जवाब दिए बिना सिर्फ यह कहना कि “राजस्थान को कोयला चाहिए, इसलिए हसदेव अरण्य में नई खदान जरूरी है”, बहस को अधूरा छोड़ देता है।
हसदेव अरण्य के जंगल को केवल कितने टन कोयले का भंडार है, इस आधार पर नहीं देखा जा सकता। जंगल पानी के स्रोतों, जैव विविधता, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों की आजीविका से जुड़ा हुआ पूरा पारिस्थितिकी तंत्र है।
कोयले का हिसाब टन में होता है, लेकिन जंगल का मूल्य सिर्फ टन में नहीं मापा जा सकता। एक पुराना जंगल जिस प्राकृतिक व्यवस्था को विकसित करता है, उसे खनन के बाद दोबारा उसी रूप में तैयार करना आसान नहीं होता।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि कोयला चाहिए या जंगल। सवाल यह है कि क्या उस कोयले की जरूरत इतनी जरूरी और तत्काल है कि उसके लिए एक समृद्ध और पुराने जंगल की कीमत चुकानी ही पड़े?
हसदेव अरण्य को बचाने की बहस को सिर्फ पर्यावरण बनाम विकास तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। यह बहस सही ऊर्जा योजना बनाम गलत प्राथमिकताओं की भी है।
अगर राजस्थान को अतिरिक्त बिजली की जरूरत है, तो सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि कितनी बिजली की जरूरत है। अगर अतिरिक्त कोयले की जरूरत है, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि कितने लाख टन कोयले की जरूरत है। मौजूदा कोयला स्रोतों से कितनी आपूर्ति हो सकती है और भविष्य की सौर, पवन तथा परमाणु ऊर्जा क्षमता जुड़ने के बाद अतिरिक्त कोयले की जरूरत कितनी बचेगी—इसका पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।
भविष्य में यदि अतिरिक्त कोयले की आवश्यकता पड़ती है, तो उसके लिए अलग-अलग आपूर्ति विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। कोयला लिंकेज, पारंपरिक ईंधन आपूर्ति समझौते और बाजार आधारित खरीद जैसे विकल्पों पर भी सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए।
क्योंकि कैप्टिव माइनिंग का अर्थ केवल कोयला निकालना नहीं है। इसके साथ जमीन, जंगल, पानी, परिवहन, प्रदूषण, स्थानीय समुदाय और लंबे समय की पर्यावरणीय तथा आर्थिक जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं।
एक बार जंगल कट गया तो उसे वापस लाने का कोई वैकल्पिक कोयला लिंकेज नहीं है। एक बार पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो गया तो उसकी भरपाई किसी आपूर्ति समझौते से नहीं की जा सकती।
यही वजह है कि हसदेव अरण्य के सामने खड़ा सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि राजस्थान को बिजली चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि उस बिजली की कीमत कौन चुकाएगा?
अगर कीमत पैसा है, तो उसका हिसाब लगाइए। अगर कीमत कोयला है, तो जरूरत का हिसाब लगाइए। लेकिन अगर कीमत एक पूरा जंगल है, तो फैसला लेने वालों को यह भी बताना होगा कि क्या वास्तव में कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
हसदेव अरण्य कोई खाली जमीन नहीं है, जिस पर सिर्फ कोयले का निशान लगा हो। यह एक पुराना प्राकृतिक जंगल है, जो स्थानीय पर्यावरण और समुदायों के जीवन से जुड़ा हुआ है।
इसलिए सवाल आज ही पूछा जाना चाहिए—राजस्थान को जितनी बिजली चाहिए, उसके लिए हसदेव अरण्य को कितना देना पड़ेगा?
अगर आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के पास पहले से कोयले के स्रोत हैं, आने वाले वर्षों में बड़ी मात्रा में सौर और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जुड़ने वाली है, परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ने वाली है और ट्रांसमिशन तथा स्टोरेज व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है, तो फिर हसदेव अरण्य के जंगल में नई खदान शुरू करने की जल्दबाजी क्यों?
पहले बिजली का हिसाब कीजिए, फिर कोयले का हिसाब कीजिए और उसके बाद ही हसदेव अरण्य में नई खदान और जंगल कटाई पर फैसला कीजिए।
क्योंकि अगर जरूरत का पूरा हिसाब ही सामने नहीं है, तो जंगल काटना विकास नहीं बल्कि ऐसा नुकसान हो सकता है जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़े।
और अंत में सबसे जरूरी सवाल यही है—हसदेव अरण्य के जंगल की कीमत कौन चुकाएगा और इस खनन से होने वाले आर्थिक लाभ का सबसे बड़ा हिस्सा किसके हिस्से में जाएगा?





