गरीबों के विनाशक बनते ओपी चौधरी?

Madhya Bharat Desk
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नागेंद्र पाण्डेय, संपादक

छत्तीसगढ़ की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में ‘विकास’ की परिभाषा हमेशा से बहसों के घेरे में रही है। लेकिन हालिया दौर में रायगढ़ से लेकर रायपुर तक उभरी दो बड़ी तस्वीरों ने इस पूरी बहस को एक बेहद संवेदनशील और डरावने मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। रसूखदारों की कॉलोनियों, कंक्रीट के बड़े ढांचों और आधुनिक इमारतों की नींव जिस तरह गरीबों के आशियानों को मलबे में तब्दील करके रखी जा रही है, उसने शासन के जन-कल्याणकारी चेहरे को बेनकाब कर दिया है। इन तमाम विवादों के केंद्र में प्रदेश के कद्दावर कैबिनेट मंत्री ओपी चौधरी और उनका विभाग खड़ा है। प्रभावित जनता और विपक्ष आज बेहद आक्रोश के साथ एक ही सवाल पूछ रहा है कि क्या एक खास वर्ग के लिए लाया जा रहा यह तथाकथित विकास, समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े गरीबों के लिए सिर्फ ‘विनाश’ की स्क्रिप्ट लिख रहा है?

कलेक्टरी का अतीत: जब उजड़े ठेले और दुकानें
गरीबों की रोजी-रोटी और छतों पर प्रशासनिक हठधर्मिता का यह बुलडोजर कोई नया नहीं है। यदि अतीत के पन्नों को पलटें, तो रायपुर कलेक्टर के रूप में ओपी चौधरी का कार्यकाल भी इसी तरह के विरोधाभासों और विवादों से भरा रहा था। ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर शहर की सड़कों को चमकाने की जो मुहिम तब चलाई गई थी, उसकी सबसे क्रूर गाज फुटपाथ पर पेट पालने वाले छोटे दुकानदारों, हाथ-ठेला चालकों और झुग्गी-झोपड़ियों पर ही गिरी थी।

प्रशासनिक रसूख के दम पर तब सैकड़ों छोटे व्यापारियों को बिना किसी मुकम्मल वैकल्पिक रोजगार व्यवस्था के रातों-रात बेदखल कर दिया गया था। फाइलों की कानूनी बारीकियों के पीछे छिपी उस प्रशासनिक सख्ती ने तब भी यह गंभीर सवाल खड़ा किया था कि क्या गरीबों और छोटे तबके को उजाड़कर ही शहर को आधुनिक बनाया जा सकता है? आज जब वे नौकरशाही से निकलकर राजनीति के शीर्ष पर बैठे हैं, तब भी उनकी कार्यशैली से वह पुराना ‘कलेक्टरी ढर्रा’ गायब नहीं हुआ है, जहाँ गरीब का रोजगार और उसका अस्तित्व प्रशासनिक प्राथमिकताओं में हमेशा सबसे आखिरी पायदान पर नजर आता है।

रायगढ़ से रायपुर: एक ही सोच की दो अमानवीय कहानियां
कलेक्टर रहते हुए जो नीति छोटे दुकानदारों के खिलाफ अपनाई गई थी, राजनेता बनते ही उसका दायरा लोगों के पक्के आशियानों तक फैल गया। इसका पहला उदाहरण बीते बरस रायगढ़ के मरीन ड्राइव (केलो तट) इलाके में देखने को मिला। छात्रों के भविष्य और शिक्षा के नाम पर ‘नालंदा परिसर’ जैसी भव्य लाइब्रेरी की आधारशिला रखने की तैयारी तो शानदार थी, लेकिन उसकी शुरुआत दशकों से वहां रह रहे करीब 15 से अधिक परिवारों को बेदखली का नोटिस थमाकर की गई। कड़ाके की ठंड की शुरुआत में लोग अपने पुश्तैनी घरों को बचाने के लिए कोर्ट से लेकर सड़कों तक गुहार लगाने को मजबूर थे। जनआक्रोश इस बात पर था कि क्या शिक्षा के किसी मंदिर का निर्माण किसी गरीब को बेघर करके ही मुमकिन है?

इस कहानी का सबसे भयावह और अमानवीय रूप हाल ही में रायपुर के नकटी गांव में सामने आया। मानसून की भारी बारिश के बीच, प्रशासनिक अमले ने बुलडोजरों के साथ धावा बोलकर लगभग 80-85 मकानों को जमींदोज कर दिया। वजह बताई गई—प्रस्तावित विधायक (MLA) कॉलोनी के लिए जमीन खाली कराना। बारिश के इस मौसम में महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को रातों-रात बेघर करने की इस क्रूरता ने न केवल विपक्ष को सड़क पर उतरने का मौका दिया, बल्कि सत्तापक्ष के भीतर से भी वरिष्ठ नेताओं को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि यह कार्रवाई सरासर अमानवीय है।

पुनर्वास के नाम पर केवल कागजी औपचारिकता
अधिकारी से नेता बने नीति-निर्माताओं से जनता यह उम्मीद करती है कि वे फाइलों से बाहर निकलकर इंसानी दर्द को समझेंगे। लेकिन रायगढ़ में बेदखली के नोटिस से लेकर रायपुर में 13-13 लोगों के बड़े परिवारों को चौथी मंजिल के महज एक कमरे के EWS फ्लैट में ठूंसने की प्रशासनिक जिद यह साफ दर्शाती है कि पुनर्वास की योजनाएं केवल कागजी खानापूर्ति के लिए हैं, इंसानों को गरिमापूर्ण जीवन देने के लिए नहीं। विस्थापन का यह दर्द झेल रहे लोग आज रायपुर में कलेक्टरेट से लेकर मंत्री के बंगले के बाहर सड़कों पर लेटने को मजबूर हैं।

विकास किसके लिए और किसकी कीमत पर?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारें जनता को संरक्षण देने के लिए चुनी जाती हैं, न कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की चकाचौंध में अपने ही नागरिकों को शरणार्थी बनाने के लिए। जब एक तरफ देश में ‘सबको पक्का मकान’ देने का नारा बुलंद किया जाता है, तो दूसरी तरफ रसूखदारों की कॉलोनियों के लिए दशकों पुराने आशियानों और रोजी-रोटी के साधनों पर बुलडोजर चलाना शासन के गहरे अंतर्विरोध को उजागर करता है।

कलेक्टर से लेकर मंत्री बनने तक के सफर में ओपी चौधरी की कार्यप्रणाली ने उनकी छवि को ‘गरीब-हितैषी’ के बजाय एक ‘आशियाना-विनाशक’ के रूप में ज्यादा चित्रित किया है। सरकार और नीति-निर्धारकों को यह समझना होगा कि कोई भी विकास तब तक न्यायसंगत या कल्याणकारी नहीं कहला सकता, जब तक उसकी चमक किसी गरीब के चूल्हे, रोजगार और उसकी आखिरी छत को छीनकर पैदा की गई हो। समय आ गया है कि इस बुलडोजर संस्कृति पर तुरंत लगाम लगे और ‘पहले मुकम्मल पुनर्वास, फिर विकास’ को एक अनिवार्य कानून बनाया जाए।

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