छत्तीसगढ़ के वन विभाग में हाल ही में घटी एक घटना ने प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर नई बहस छेड़ दी है। जानकारी के अनुसार, एक वन मंडल में पदस्थ कनिष्ठ अधिकारी ने मंत्रालय में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी के लिए कथित रूप से आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। मामले की जानकारी सामने आने के बाद लगभग 15 दिनों में संबंधित कनिष्ठ अधिकारी को निलंबित कर दिया गया। विभागीय स्तर पर इसे अनुशासनात्मक कार्रवाई बताया जा रहा है, लेकिन इसी के साथ कार्रवाई के तरीकों को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।
जिला और वन मंडल स्तर पर काम कर रहे अधिकारियों पर अक्सर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, विधानसभा प्रश्नों के जवाब, ऑडिट आपत्तियों, मुख्यालय बैठकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों तथा पत्रकारों के साथ समन्वय का भारी दबाव रहता है। ऐसे माहौल में कई बार कार्यस्थल पर तनावपूर्ण परिस्थितियां भी बन जाती हैं।
इसी बीच बलौदा बाजार वन मंडल के अंतर्गत कसडोल सब डिवीजन से जुड़ा एक अन्य मामला भी चर्चा में है। यहां पदस्थ रेंजर सुमित साहू के खिलाफ अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और अपमानजनक व्यवहार की शिकायतें सामने आई थीं। वन कर्मचारी संघ ने इस विषय पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कार्रवाई की मांग की थी। प्रारंभिक जांच वन मंडल स्तर पर कराई गई, लेकिन उसके बाद कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। बाद में वन संरक्षक द्वारा अन्य डिवीजनों के तीन उप वन मंडल अधिकारियों की टीम गठित कर दोबारा जांच शुरू की गई। बताया जाता है कि यह जांच उपवन मंडल अधिकारी यू.आर. बसंत के नेतृत्व में की गई, किंतु रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है और अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
इसी बिंदु पर विभाग के भीतर और कर्मचारी संगठनों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या अनुशासनात्मक मामलों में समान मानक अपनाए जा रहे हैं। एक मामले में अपेक्षाकृत त्वरित निलंबन और दूसरे मामले में लंबित जांच ने पारदर्शिता और समानता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि विभाग की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। अब नजर इस बात पर है कि लंबित जांच रिपोर्ट पर कब निर्णय होता है और क्या विभाग सभी स्तरों पर एक समान अनुशासनात्मक मानक लागू करता है।






