छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर चौंकाने वाली स्थिति सामने आई है। प्रदेश में करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदी गई ब्लड टेस्ट और डिजिटल एक्स-रे मशीनें लंबे समय से बंद पड़ी हैं, जिसके कारण 500 से अधिक सरकारी हेल्थ सेंटरों में जरूरी खून जांच पूरी तरह ठप हो चुकी है।
हालत यह है कि पिछले करीब दो वर्षों से मरीज बिना जांच के ही लौटने को मजबूर हैं और उन्हें निजी लैब में पैसे खर्च कर टेस्ट कराना पड़ रहा है।
जमीनी रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 800 प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में सीबीसी, ब्लड शुगर, थायराइड, किडनी और लीवर फंक्शन जैसी बुनियादी जांच तक नहीं हो रही। कई जगह मशीनें खराब पड़ी हैं, तो कहीं रिएजेंट की आपूर्ति ही नहीं हो पाई।
सवाल यह उठ रहा है कि जब करोड़ों रुपये खर्च कर उपकरण खरीदे गए, तो उनके रखरखाव और नियमित सप्लाई की योजना क्यों नहीं बनाई गई।
इस पूरे मामले में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की भूमिका पर भी तीखे सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष और आम लोगों का आरोप है कि दो साल तक मरीज परेशान होते रहे, लेकिन न तो जवाबदेही तय हुई और न ही सिस्टम सुधारने के ठोस कदम दिखे। इसे केवल लापरवाही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र की गंभीर विफलता माना जा रहा है।
हालांकि स्वास्थ्य विभाग अब नई एजेंसी से करार कर जल्द सेवाएं शुरू करने का दावा कर रहा है, लेकिन जनता पूछ रही है
जब मशीनें बंद थीं, मरीज भटक रहे थे और करोड़ों रुपये बेकार हो रहे थे, तब जिम्मेदार आखिर क्या कर रहे थे? विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट तकनीकी नहीं, बल्कि नीति, निगरानी और जवाबदेही की गहरी कमी को उजागर करता है।







