दिव्यांग बच्चों को सहानुभूति नहीं, अवसर चाहिए: बृजमोहन अग्रवाल

Madhya Bharat Desk
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रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद की ओर से दिव्यांग बच्चों के विकास, शिक्षा, अधिकार और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए शनिवार 4 जुलाई 2026 को विमतारा भवन, रायपुर में एक दिवसीय सेमिनार आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद के अध्यक्ष और रायपुर लोकसभा सांसद बृजमोहन अग्रवाल शामिल हुए। इसके अलावा अलग-अलग विभागों के अधिकारी, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता, अभिभावक और दिव्यांग बच्चों के हित में काम करने वाले संगठनों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास को लेकर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। इसी मकसद से यह संगोष्ठी आयोजित की गई, ताकि इस बात पर चर्चा हो सके कि दिव्यांग बच्चों को कैसी शिक्षा मिले, उन्हें किस तरह प्रशिक्षित किया जाए और उनकी विशेष क्षमताओं को कैसे आगे बढ़ाया जाए।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “विकलांग” की जगह “दिव्यांग” शब्द दिया। इसका मतलब यह है कि जिन बच्चों के शरीर में किसी तरह की कमी है, उनमें भगवान ने कोई न कोई खास क्षमता भी दी है। जरूरत इस बात की है कि उनकी उस खास प्रतिभा को पहचाना जाए और उसे आगे बढ़ाया जाए। उन्हें सहानुभूति से ज्यादा सहयोग और प्रोत्साहन की जरूरत है।

अग्रवाल ने कहा कि बाल कल्याण परिषद लगातार इस दिशा में काम कर रही है। सेंट्रल इंडिया में यह एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के दिव्यांग बच्चों को कम खर्च में उपचार, प्रशिक्षण और पुनर्वास की सुविधा दी जा रही है। निजी अस्पतालों में जिन सुविधाओं के लिए रोज हजारों रुपये खर्च होते हैं, वही सुविधाएं यहां बेहद कम शुल्क में उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि इस केंद्र को समाज और शासन दोनों से ज्यादा सहयोग मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज भी छत्तीसगढ़ में दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल शिक्षा और खासकर उच्च शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। अगर इन बच्चों को सही शिक्षा और अवसर मिलें तो इससे सिर्फ उनका ही नहीं, पूरे परिवार का जीवन बेहतर हो सकता है।

सांसद अग्रवाल ने नवजात और छोटे बच्चों की समय पर स्क्रीनिंग पर जोर देते हुए कहा कि कई बार माता-पिता को 3-4 साल बाद पता चलता है कि बच्चा सुन नहीं पा रहा, बोल नहीं पा रहा या किसी अन्य दिव्यांगता से प्रभावित है। अगर 2 साल की उम्र से पहले आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए नियमित जांच हो जाए तो समय रहते इलाज संभव है और कई समस्याओं के असर को काफी कम किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि जिला अस्पतालों में आधुनिक स्क्रीनिंग मशीनें, प्रशिक्षित स्टाफ, बेहतर रेफरल सिस्टम और पुनर्वास सेवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इस दिशा में गंभीरता से काम करना समाज और देश की बड़ी सेवा होगी।

अग्रवाल ने कहा कि नई शिक्षा नीति में दिव्यांग बच्चों की शिक्षा को लेकर कई प्रावधान हैं, लेकिन उनका सही तरीके से क्रियान्वयन जरूरी है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत मिलने वाली राशि का एक हिस्सा दिव्यांग बच्चों की शिक्षा पर खर्च होना चाहिए और हर स्कूल में उनके लिए बेहतर शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी विशेष शिक्षकों की उपलब्धता पर जोर दे चुका है, लेकिन छत्तीसगढ़ में अभी भी बड़ी संख्या में स्पेशल एजुकेटर्स की जरूरत है। इस दिशा में बाल कल्याण परिषद और संबंधित संस्थाओं को मिलकर सरकार के सामने ठोस सुझाव रखने चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान परिषद के महासचिव चंद्रेश शाह ने बताया कि सेमिनार में दिव्यांग बच्चों के समग्र विकास, समावेशी शिक्षा, पुनर्वास और उनके अधिकारों से जुड़े विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत दिव्यांग बच्चों के लिए तय मानकों, अवसरों और योजनाओं पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि हमें सिर्फ दिखावटी नहीं बल्कि संवेदनशील काम करने की जरूरत है। यह बच्चे हमारे दिव्यपुष्प हैं और इन्हें सहेजने का काम यह संस्था कर रही है।

उन्होंने कहा कि हमें “मेरा बच्चा-तेरा बच्चा” जैसी सोच से ऊपर उठना होगा और यह समझना होगा कि हर बच्चा समाज की जिम्मेदारी है।

इस दौरान डॉ. कमल वर्मा ने कहा कि डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों की पहचान गर्भावस्था के दौरान जांच से संभव है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में जागरूकता और सुविधाओं की कमी के कारण कई मामलों का समय पर पता नहीं चल पाता। उन्होंने मितानिनों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के जरिए गर्भवती महिलाओं की जांच बढ़ाने पर जोर दिया। साथ ही जन्म के बाद 6 महीने के भीतर बच्चों में संभावित दिव्यांगता की जांच अनिवार्य करने की मांग रखी।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान, सही इलाज और पुनर्वास सेवाओं से दिव्यांग बच्चों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

सेमिनार में इग्नू के डॉ. आलोक उपाध्याय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के योगेंद्र पांडे, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी सज्जाद नकवी, सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता सुगंधा जैन और डाइटिशियन डॉ. सारिका श्रीवास्तव विशेषज्ञ के रूप में मौजूद रहे। सभी ने बच्चों की देखभाल और उनसे जुड़े विषयों पर विस्तार से चर्चा की।

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