मध्यप्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की भारी कमी और स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के बीच दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की खंडपीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर 17 अगस्त 2026 तक जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बीपुल जैन द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभिषेक बुगनावत ने अदालत को बताया कि शिक्षकों की भारी कमी और मूलभूत सुविधाओं के अभाव का सीधा असर लाखों विद्यार्थियों के शिक्षा के अधिकार पर पड़ रहा है।
याचिका के अनुसार प्रदेश में 2.89 लाख स्वीकृत शिक्षक पदों में से 1,15,678 पद रिक्त हैं, यानी लगभग 40 प्रतिशत पद खाली हैं। इतना ही नहीं, 1,895 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है। याचिका में दावा किया गया है कि हजारों स्कूल बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं और कई स्कूल आज भी झोपड़ियों में संचालित हो रहे हैं।
याचिका में यह भी कहा गया है कि पिछले 10 वर्षों में कक्षा 1 से 12 तक सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 22 लाख 3 हजार कम हुई है। इसे सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर लोगों के घटते भरोसे का संकेत बताया गया है। संविधान के अनुच्छेद-45 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 का हवाला देते हुए कहा गया कि बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
प्रदेश के सरकारी स्कूलों की स्थिति
- स्वीकृत शिक्षक पद – 2.89 लाख
- रिक्त शिक्षक पद – 1,15,678
- बिना शिक्षक वाले स्कूल – 1,895
- जर्जर भवन वाले स्कूल – 5,000
- शौचालय विहीन स्कूल – 3,400
- बिजली रहित स्कूल – 10,000
- बाउंड्री वॉल नहीं – 40,000
- कंप्यूटर नहीं – 59,000
जनहित याचिका में स्कूलों के निर्माण और मरम्मत कार्यों में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए हैं। इन आरोपों पर हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। फिलहाल इस मामले में सरकार का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है।
याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि जनवरी 2026 में हाई कोर्ट ने सरकारी और निजी स्कूलों में छात्रों के लिए सुरक्षित पेयजल, अलग शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। साथ ही इन निर्देशों का पालन नहीं करने वाले स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश भी जारी किए गए थे। इसके बावजूद हालात में अपेक्षित सुधार नहीं होने का दावा करते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है।




