कॉर्पोरेट हितों के आगे झुक रहा है नेतृत्व!

Madhya Bharat Desk
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नागेंद्र पाण्डेय, संपादक

छत्तीसगढ़ की राजनीति में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की छवि हमेशा से एक सौम्य, सरल और संवेदनशील राजनेता की रही है। देश के सबसे बड़े आदिवासी बहुल राज्यों में से एक की कमान जब एक आदिवासी अंचल से आने वाले नेतृत्वकर्ता को सौंपी गई, तो स्वाभाविक रूप से वनों, आदिवासियों और पर्यावरण के प्रति राज्य सरकार की संवेदनशीलता से उम्मीदें कई गुना बढ़ गई थीं। लेकिन हाल ही में ऐतिहासिक रामगढ़ महोत्सव के मंच से मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया बयान न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों के प्रति राज्य के बदलते प्राथमिकताओं की ओर भी इशारा करता है। विकास के नाम पर ‘एक पेड़ लगाकर लाखों पेड़ काटने’ की वकालत करना किसी भी दृष्टिकोण से एक संवेदनशील आदिवासी मुख्यमंत्री के मुख से न्यायसंगत नहीं प्रतीत होता।

यह बयान इसलिए भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और आहत करने वाला है क्योंकि यह उसी धरती पर दिया गया, जहाँ का आदिवासी समुदाय सालों से अपने अस्तित्व, अपनी संस्कृति और अपने जंगलों को बचाने के लिए सड़कों पर है। रामगढ़ और उससे सटा हसदेव अरण्य का इलाका सिर्फ भौगोलिक भूभाग या कोयले का भंडार भर नहीं है; यह महाकवि कालिदास की ऐतिहासिक कर्मस्थली है और जैव विविधता का एक ऐसा समृद्ध केंद्र है जिसे दोबारा कृत्रिम रूप से निर्मित नहीं किया जा सकता। जब इसी अंचल का कोई ग्रामीण जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए लाठियां खा रहा हो या मीलों पदयात्रा कर रहा हो, तब सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति द्वारा वनों की कटाई को परोक्ष रूप से जायज ठहराना जनभावनाओं के साथ एक क्रूर मज़ाक जैसा प्रतीत होता है।

इस पूरे परिदृश्य के पीछे कॉर्पोरेट हितों, विशेषकर अडानी समूह को आवंटित कोल ब्लॉकों और औद्योगिक लॉबिंग की परछाई साफ देखी जा सकती है। जब कोई सरकार पर्यावरण संरक्षण की कीमत पर औद्योगिक घरानों के पक्ष में खड़ी दिखने लगती है, तो उसकी लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल उठना लाजिमी है। यदि सरकार को यह लगता है कि ‘कैंपा’ (CAMPA) जैसी योजनाओं के तहत किया जाने वाला वृक्षारोपण इस विनाश की भरपाई कर सकता है, तो उसे बीते ढाई-तीन वर्षों का अपना रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक करना चाहिए। सरकार को यह बताना चाहिए कि कागजों पर रोपे गए लाखों पौधों में से कितने पौधे आज जमीनी हकीकत में जीवित वृक्ष बन पाए हैं? केवल कागजी आंकड़ों से सदियों पुराने जंगलों के विनाश को छुपाया नहीं जा सकता।

समय आ गया है कि सरकार ‘विकास बनाम पर्यावरण’ की इस सतही बहस से ऊपर उठे। आदिवासी समाज के लिए जंगल सिर्फ लकड़ी या आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी अस्मिता और जीवन का आधार हैं। मुख्यमंत्री साय को यह समझना होगा कि उनकी सौम्यता और संवेदनशीलता की असली परीक्षा कॉर्पोरेट अनुकूल नीतियां बनाने में नहीं, बल्कि अपने ही समाज और अपनी ही माटी की रक्षा करने में है। इस बयान पर केवल स्पष्टीकरण देना ही काफी नहीं होगा, बल्कि सरकार को श्वेत पत्र जारी कर यह भी बताना चाहिए कि अब तक लगाए गए उद्योगों से स्थानीय आदिवासियों को क्या मिला—सिर्फ विस्थापन या वास्तव में कोई प्रगति? विकास की अंधी दौड़ में अगर हम अपनी फेफड़े रूपी प्राकृतिक संपदा को ही गंवा देंगे, तो ऐसा विकास अंततः विनाश का ही मार्ग प्रशस्त करेगा।

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