रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रहने वाले 53 वर्षीय किसान अश्विनी बांधे ने एक ऐसा दावा किया है, जिससे स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट की जमीन को लेकर पुराना विवाद फिर चर्चा में आ गया है। अश्विनी बांधे का कहना है कि एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और सामने बना गार्डन उनके पूर्वजों की जमीन पर बना है। इसी आधार पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में करीब 3500 करोड़ रुपए मुआवजे की मांग की है।
बांधे का कहना है कि यह रकम सिर्फ जमीन की कीमत नहीं है, बल्कि 1942 से अब तक का बकाया किराया, उस पर ब्याज और दूसरे कानूनी दावों को जोड़कर निकाली गई है। मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
35 साल से दस्तावेजों के दम पर लड़ रहे लड़ाई
अश्विनी बांधे बताते हैं कि पिछले 35 साल से वे अपनी जमीन से जुड़े दस्तावेज जुटाने में लगे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने खेती से ज्यादा समय सरकारी रिकॉर्ड रूम, राजस्व दफ्तर, लाइब्रेरी और अदालतों के चक्कर लगाने में बिताया है।
उनके मुताबिक, 1990 के दशक में जब उन्होंने रिकॉर्ड खंगालना शुरू किया था, तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह लड़ाई 3 दशक से ज्यादा लंबी हो जाएगी। आज उनके पास कई ऐसे सरकारी दस्तावेज हैं, जो आसानी से मिलना मुश्किल है।
बांधे कहते हैं, “मेरे पास ऐसी फाइलें हैं, जो गूगल पर भी नहीं मिलेंगी।”






हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे
बांधे के अनुसार, इस साल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले में संबंधित पक्षों को दोबारा जांच के निर्देश दिए थे। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां उनकी याचिका फिलहाल विचाराधीन है।
1942 में युद्ध के दौरान ली गई थी जमीन
बांधे के दावे के मुताबिक, विवाद की शुरुआत 1942 में हुई थी। उस समय द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट 1939 के तहत सैन्य जरूरतों के लिए माना एयरफील्ड बनाने हेतु कई गांवों की जमीन अस्थायी रूप से ली थी।
उनका कहना है कि उनके पूर्वजों की करीब 30 एकड़ 18 डिसमिल जमीन भी इसी प्रक्रिया में ली गई थी। दस्तावेजों के अनुसार उस समय सरकार ने 1300 रुपए सालाना किराया तय किया था।
बांधे का आरोप है कि उनके परिवार को यह किराया कभी नहीं मिला और युद्ध खत्म होने के बाद भी जमीन वापस नहीं की गई।
संस्कृति विभाग के रिकॉर्ड बने बड़ा आधार
करीब एक साल पहले रायपुर में संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित पुराने दस्तावेजों की प्रदर्शनी में अश्विनी बांधे पहुंचे थे। उनका कहना है कि वहां उन्हें माना एयरफील्ड से जुड़े कई पुराने रिकॉर्ड मिले, जिनमें उनके पूर्वजों की जमीन का जिक्र भी था।
इसके बाद उन्होंने लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत इन दस्तावेजों की प्रमाणित कॉपी हासिल की, जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किया गया है।
संस्कृति विभाग के उपसंचालक डॉ. प्रताप पारेख ने भी पुष्टि की है कि विभाग के पास द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान माना एयरफील्ड के लिए अधिग्रहित जमीनों से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड सुरक्षित हैं।
1978 और 1985 के सरकारी पत्रों का हवाला
अश्विनी बांधे अपनी कानूनी लड़ाई में 1978 और 1985 के दो सरकारी पत्रों को बेहद अहम मानते हैं।
उनके मुताबिक, 24 मई 1978 को केंद्र सरकार के मंत्रालय ने रायपुर कलेक्टर को भेजे पत्र में रामचंडी (बरौदा) गांव के भू-स्वामी मोहन, पिता अनुप लाल के नाम जमीन लौटाने का उल्लेख किया था। बांधे का दावा है कि मोहन उनके पिता थे।
इसके अलावा 1985 में केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय ने निर्देश जारी किए थे कि युद्धकाल में रिक्विजिशन के तहत ली गई जमीनों पर कार्रवाई की जाए। जरूरत नहीं होने पर जमीन मूल मालिकों को लौटाई जाए या जरूरत होने पर स्थायी अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी की जाए।
बांधे का आरोप है कि इन निर्देशों के बावजूद उनके परिवार को जमीन नहीं मिली और राजस्व रिकॉर्ड में नाम भी बहाल नहीं किया गया।
एयरपोर्ट ही नहीं, नवा रायपुर की जमीनों पर भी दावा
अश्विनी बांधे का कहना है कि मामला सिर्फ रायपुर एयरपोर्ट तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, नवा रायपुर और आसपास की कुछ दूसरी जमीनों से जुड़े भी ऐसे दस्तावेज उनके पास हैं, जिन पर अलग-अलग स्तर पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर
करीब 35 साल से दस्तावेजों के सहारे कानूनी लड़ाई लड़ रहे अश्विनी बांधे का कहना है कि अब उन्हें न्यायपालिका पर भरोसा है। उनका दावा है कि उनके पास मौजूद रिकॉर्ड और सरकारी दस्तावेज साबित करते हैं कि जमीन अस्थायी तौर पर ली गई थी।
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है। कोर्ट यह तय करेगा कि अश्विनी बांधे का दावा कानूनी रूप से कितना मजबूत है और उन्हें मुआवजा या दूसरी राहत मिल सकती है या नहीं। फिलहाल मामला अदालत में विचाराधीन है।





