देशभर में चल रही जल जीवन मिशन और नल जल योजना को सरकार बड़ी सफलता के रूप में पेश कर रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, हर घर तक नल से पानी पहुंचाने का लक्ष्य लगभग पूरा हो चुका है। लेकिन जब इन दावों की हकीकत गांवों में जाकर देखी जाती है, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है।
कई ग्रामीण इलाकों में नल तो लगाए गए हैं, लेकिन उनमें पानी की एक बूंद तक नहीं आ रही। लोग आज भी पानी के लिए पुराने स्रोतों—कुएं, हैंडपंप या दूर-दराज के जलस्रोतों पर निर्भर हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सरकारी रिकॉर्ड और जमीनी सच्चाई में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि योजना के नाम पर सिर्फ कागजी काम पूरा किया गया है, जबकि असली सुविधाएं अब तक नहीं पहुंच पाई हैं। यह स्थिति साफ तौर पर लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है।
सबसे बड़ा सवाल निगरानी तंत्र पर खड़ा होता है। जब योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तो उनकी सही मॉनिटरिंग क्यों नहीं हो रही? जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं की जा रही?
शासन स्तर पर इस मुद्दे को लेकर चुप्पी और भी चिंता बढ़ा रही है। अगर समय रहते पारदर्शी जांच और ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह योजना भी जनता के भरोसे को तोड़ने वाली साबित हो सकती है।







