नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब केवल तापमान वृद्धि या समुद्र स्तर बढ़ने तक सीमित नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन में सामने आया है कि इसका असर पृथ्वी की मूलभूत भौतिक प्रक्रियाओं पर भी पड़ने लगा है। शोध के अनुसार ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने और समुद्र के जल स्तर में वृद्धि के कारण पृथ्वी के द्रव्यमान का संतुलन बदल रहा है, जिससे उसकी घूर्णन गति धीरे-धीरे धीमी हो रही है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इसी वजह से पृथ्वी पर दिन की अवधि बहुत मामूली स्तर पर बढ़ने लगी है। अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2000 से 2020 के बीच दिन की लंबाई बढ़ने की दर करीब 1.33 मिलीसेकंड प्रति सदी दर्ज की गई है, जो पिछले लगभग 36 लाख वर्षों में सबसे तेज बदलाव माना जा रहा है।
ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ी चिंता
आमतौर पर हम मानते हैं कि पृथ्वी पर एक दिन हमेशा 24 घंटे का होता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह अवधि स्थिर नहीं रहती। पृथ्वी की घूर्णन गति कई प्राकृतिक कारणों से प्रभावित होती है।
चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी पर ज्वारीय प्रभाव पैदा करता है, जो लंबे समय में पृथ्वी की गति को धीरे-धीरे कम करता है। इसके अलावा ग्लेशियरों की बर्फ, महासागरों का जल और वायुमंडलीय द्रव्यमान में होने वाले बदलाव भी पृथ्वी की घूर्णन गति को प्रभावित करते हैं।
जलवायु परिवर्तन बना प्रमुख कारण
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के भीतर होने वाली भू-वैज्ञानिक गतिविधियां, जैसे टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल और भूकंप, भी घूर्णन गति में सूक्ष्म परिवर्तन ला सकती हैं।
हालांकि जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च में प्रकाशित इस अध्ययन में बताया गया है कि 21वीं सदी में जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की घूर्णन गति को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरा है।
अतीत की तुलना में आज बदलाव तेज
शोध में बताया गया है कि क्वाटरनेरी काल, जो लगभग 26 लाख वर्ष पहले शुरू हुआ था, उस दौरान भी कई बार बड़े पैमाने पर ग्लेशियर पिघले और समुद्र का स्तर बढ़ा। लेकिन उस समय दिन की लंबाई में होने वाला परिवर्तन आज की तुलना में काफी धीमा था।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान में दर्ज बदलाव पिछले 36 लाख वर्षों में सबसे तेज हैं। हालांकि लगभग 20 लाख वर्ष पहले कुछ समय के लिए ऐसी स्थिति आंशिक रूप से देखने को मिली थी।
तकनीकी और वैज्ञानिक प्रणालियों पर असर
हालांकि दिन की लंबाई में यह बदलाव केवल मिलीसेकंड के स्तर पर है, लेकिन इसका प्रभाव कई संवेदनशील तकनीकी प्रणालियों पर पड़ सकता है।
पृथ्वी की घूर्णन गति का सटीक मापन सैटेलाइट संचालन, अंतरिक्ष मिशनों की नेविगेशन प्रणाली, जीपीएस टाइमिंग और खगोलशास्त्रीय अनुसंधान के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि पृथ्वी की गति में बदलाव होता है, तो इन प्रणालियों की समय और स्थान संबंधी गणनाओं में भी समायोजन करना पड़ सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के ऐसे प्रभाव यह संकेत देते हैं कि मानव गतिविधियों से होने वाले पर्यावरणीय बदलाव अब पृथ्वी की प्राकृतिक प्रक्रियाओं तक को प्रभावित करने लगे हैं।







