क्या छत्तीसगढ़ में कम हो रही है पीएम मोदी की लोकप्रियता?

Madhya Bharat Desk
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रायपुर: भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी ताकत रही है उनकी अपील करने की क्षमता। साल 2015 में उनके एक कहने पर देश के करोड़ों लोगों ने एलपीजी (LPG) सब्सिडी छोड़ दी थी, और 2016 में नोटबंदी के समय लंबी लाइनों में लगने के बावजूद जनता उनके साथ खड़ी थी। लेकिन मई 2026 की जमीनी हकीकत कुछ और ही इशारा कर रही है। 10 मई को पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने की उनकी भावुक अपील को छत्तीसगढ़ की जनता ने न सिर्फ नजरअंदाज किया, बल्कि इसके बिल्कुल विपरीत व्यवहार किया।

राजनीतिक गलियारों और चौक-चौराहों पर अब एक ही सवाल तैर रहा है-क्या देश और खासकर छत्तीसगढ़ में पीएम मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिर रहा है, या फिर जनता का सरकार की नीतियों से भरोसा डगमगा गया है?

राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में पेट्रोल की बिक्री में 22% और डीजल में 17% का उछाल केवल एक ‘आर्थिक आंकड़ा’ नहीं है, बल्कि यह एक गहरा राजनीतिक संदेश है। इसके पीछे तीन मुख्य वजहें नजर आती हैं:

  1. ‘क्रेडिबिलिटी गैप’ (विश्वास का संकट)
    अब वह दौर बदल रहा है जब पीएम के कहते ही जनता बिना सोचे-समझे भरोसा कर लेती थी। छत्तीसगढ़ के इस रवैये से साफ है कि जनता अब बयानों से ज्यादा अपनी जेब और भविष्य की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है। लोगों को लगा कि अगर प्रधानमंत्री खुद आकर तेल कम खर्च करने को कह रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि आने वाले दिनों में या तो भारी किल्लत होने वाली है या दाम आसमान छूने वाले हैं। जनता ने पीएम की बात मानकर ‘त्याग’ करने के बजाय खुद को सुरक्षित करना (स्टॉक करना) बेहतर समझा।
  2. नीतियों और बयानों का अंतर्विरोध
    जनता अब सोशल मीडिया और सूचनाओं के युग में बहुत जागरूक है। एक तरफ पीएम कहते हैं कि संकट है, दूसरी तरफ सरकार के आंकड़े (703 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार) कहते हैं कि सब ठीक है। इस विरोधाभास ने जनता के मन में यह धारणा मजबूत कर दी है कि सरकार सच छिपा रही है। जब किसी नेतृत्व की बातों में पारदर्शिता की कमी दिखने लगती है, तो उसकी लोकप्रियता और प्रभाव दोनों पर आंच आती है।
  3. अपील थकान
    विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार हर संकट में जनता से ही सामूहिक जिम्मेदारी और तपस्या की उम्मीद करना अब बैकफायर कर रहा है। कभी टैक्स का बोझ, कभी महंगाई, और अब अंतरराष्ट्रीय संकट का बहाना बनाकर आम आदमी से गाड़ी न चलाने या सोना न खरीदने की उम्मीद करना जनता को रास नहीं आ रहा है। छत्तीसगढ़ के लोगों का यह कदम सरकार की इसी अपील पॉलिटिक्स के खिलाफ एक मूक प्रतिरोध (Silent Protest) जैसा है।

वजह चाहे जो भी हो, लेकिन राजनीति में क्रोनोलॉजी और परसेप्शन का बड़ा महत्व होता है। प्रधानमंत्री की अपील के ठीक बाद छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ईंधन की बिक्री का रिकॉर्ड तोड़ देना यह साबित करने के लिए काफी है कि अब जनता आंख मूंदकर अपील स्वीकार करने के मूड में नहीं है। नेतृत्व का जादू अब आर्थिक वास्तविकताओं और महंगाई के डर के आगे थोड़ा बेअसर पड़ता दिखाई दे रहा है।

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