पश्चिम एशिया में जंग का असर: तेल कीमतों में उछाल, क्या महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?

Madhya Bharat Desk
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पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य टकराव ने दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में हलचल मचा दी है। अमेरिका और इस्राइल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों और उसके जवाबी एक्शन के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल और महंगे हो जाएंगे?

 तेल बाजार में अचानक तेजी

अंतरराष्ट्रीय बाजार खुलते ही निवेशकों में घबराहट साफ नजर आई। अमेरिका का हल्का कच्चा तेल वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब 72 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो पिछले स्तर से लगभग 8 प्रतिशत ज्यादा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो कीमतों में और उछाल संभव है।

 होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा

तनाव का सबसे संवेदनशील बिंदु है होर्मुज जलडमरूमध्य, जो फारस की खाड़ी से निकलने वाला अहम समुद्री मार्ग है। दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत यहीं से गुजरता है। हर दिन करीब 1.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है।

हाल में इस मार्ग से गुजरने वाले दो जहाजों पर हमले की खबर ने ऊर्जा बाजार की चिंता और बढ़ा दी है। अगर इस समुद्री रास्ते पर आवाजाही बाधित होती है, तो सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई, कतर और ईरान जैसे प्रमुख निर्यातक देशों की सप्लाई पर असर पड़ सकता है।

 OPEC+ की कोशिश

बढ़ते दबाव के बीच OPEC+ समूह के आठ देशों ने उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है। अप्रैल से रोजाना 2 लाख 6 हजार बैरल अतिरिक्त उत्पादन करने की घोषणा की गई है। इस फैसले में सऊदी अरब, रूस, इराक, यूएई, कुवैत, कजाखस्तान, अल्जीरिया और ओमान शामिल हैं।

हालांकि ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि केवल उत्पादन बढ़ाना काफी नहीं होगा, जब तक समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाते।

 ईरान के निर्यात पर असर

ईरान रोजाना लगभग 16 लाख बैरल तेल निर्यात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा चीन को जाता है। यदि क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है और निर्यात बाधित होता है, तो चीन जैसे बड़े आयातक देशों को वैकल्पिक स्रोत ढूंढने पड़ सकते हैं। इससे वैश्विक मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ सकता है।

 वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित असर

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। महंगाई दर, शेयर बाजार और कई देशों की आर्थिक विकास दर पर इसका असर दिखाई दे सकता है। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है।

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