अमेरिका का ‘नॉनवेज दूध’ भारत में बेचने की कोशिश, मोदी सरकार ने मांगा प्रमाण

Madhya Bharat Desk
3 Min Read

नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की राह में अब एक ऐसा मुद्दा खड़ा हो गया है जिसकी जड़ें सिर्फ अर्थव्यवस्था में नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आस्था में भी गहराई से जुड़ी हैं – वह है अमेरिका से दूध और डेयरी उत्पादों का आयात।

क्या है विवाद:

मुद्दा ये है कि अमेरिका जिन गायों का दूध भारत को बेचने की तैयारी में है, उन्हें विशेष प्रकार का चारा दिया जाता है जिसे ब्लड मील कहा जाता है। इस चारे में सूअर, मछली, मुर्गी, घोड़े और अन्य जानवरों के मांस, खून, हड्डियों और अवशेषों को मिलाया जाता है। अमेरिकी रिपोर्टों, खासकर Seattle Times के अनुसार, इस तरह के मिश्रण का उपयोग बड़े पैमाने पर डेयरी फार्मों में होता है।

क्या दूध अब शाकाहारी नहीं रहा?

इस मुद्दे ने सांस्कृतिक बहस को जन्म दे दिया है कि क्या ऐसा दूध शाकाहारी कहा जा सकता है? भारत जैसे देश में जहाँ करोड़ों लोग शुद्ध शाकाहार को मानते हैं, वहाँ ऐसा “नॉनवेज दूध” स्वीकार्य नहीं हो सकता।

सरकार का रुख:

मोदी सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका को पहले यह प्रमाण देना होगा कि जिन गायों से दूध निकाला गया है, उन्हें कभी भी मांस या किसी जानवर आधारित आहार नहीं दिया गया है। भारत ने स्पष्ट रूप से सत्यापित प्रमाणपत्र की मांग की है।

आर्थिक पहलू:

State Bank of India की रिपोर्ट बताती है कि यदि भारत अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए बाजार खोल देता है, तो इससे घरेलू दूध की कीमतों में 15% तक गिरावट आ सकती है। इसके परिणामस्वरूप देश के किसानों को हर साल ₹1.03 लाख करोड़ तक का नुकसान हो सकता है।

क्यों बेच रहा है अमेरिका दूध?

अमेरिका की बड़ी डेयरी कंपनियों पर उत्पादन दबाव है और घरेलू मांग सीमित हो चुकी है। अब वे भारत जैसे विशाल उपभोक्ता बाजार में अपने उत्पाद बेचने की कोशिश कर रही हैं।

क्या दूध बनेगा व्यापार समझौते की दीवार?

फिलहाल, अमेरिका की कोशिश है कि भारत अपने डेयरी सेक्टर को उनके लिए खोले। लेकिन यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मुद्दा भी बन गया है। भारत इस मामले में समझौता करने को तैयार नहीं लगता।

Share on WhatsApp

Share This Article
Leave a Comment