लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है। सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं — खासकर तब, जब मामला किसी बड़े विवाद या कथित घोटाले से जुड़ा हो। लेकिन क्या हो जब सवाल उठाने की कोशिश ही नारों के शोर में दब जाए?
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की हालिया सभा में कुछ ऐसा ही दृश्य सामने आया। सभा के दौरान एक युवक, जो स्वयं को व्यापम प्रकरण से प्रभावित परिवार का सदस्य बता रहा था, मंच के सामने अपनी बात रखने की कोशिश कर रहा था। उसका आरोप था कि उसके साथ अन्याय हुआ है और अब तक उसे न्याय नहीं मिला।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही युवक ने बोलना शुरू किया, मंच संचालन कर रहे लोगों ने “भारत माता की जय” के नारे लगवाने शुरू कर दिए। कुछ ही क्षणों में पूरा पंडाल नारों से गूंज उठा और युवक की आवाज उसी शोर में खो गई।
“भारत माता की जय” नारा देश के सम्मान और गौरव का प्रतीक है। लेकिन यदि किसी नागरिक की शिकायत को दबाने के लिए इसी नारे का सहारा लिया जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देशभक्ति जवाबदेही से ऊपर हो सकती है?
राजनीतिक मंचों पर नारे लगना सामान्य बात है। लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत इस बात में निहित है कि वह असहमति और सवालों को कितनी जगह देता है। सवाल यह नहीं कि नारे क्यों लगे — सवाल यह है कि क्या उस युवक की आवाज सुनी गई?
जब जनता के प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं मिलता, तो अक्सर शोर बढ़ जाता है। लेकिन लोकतंत्र में स्थायी समाधान संवाद से ही निकलता है, न कि शोर से।







