रायपुर। सरकार ने हाल ही में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर की कीमत में 1 रुपये की कटौती की है। अब 1 लीटर पानी की बोतल 15 रुपये के बजाय 14 रुपये में मिलनी चाहिए। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंड और कई सार्वजनिक जगहों पर यात्रियों को अब भी पानी की बोतल 15 रुपये में ही दी जा रही है। जब ग्राहक 14 रुपये की मांग करता है, तो दुकानदार अक्सर जवाब देते हैं — “1 रुपये का चिल्लर नहीं है।” और इस तरह हर बोतल पर 1 रुपये अतिरिक्त वसूला जा रहा है।
बोर्ड नहीं, जानकारी नहीं
सबसे बड़ी बात यह है कि कई जगहों पर कीमत कम होने की जानकारी देने वाला कोई बोर्ड तक नहीं लगाया गया है। यात्रियों को यह मालूम ही नहीं कि पानी की बोतल अब सस्ती हो चुकी है। नतीजा यह है कि लोग पुराने रेट पर ही खरीदारी कर रहे हैं।
1 रुपया छोटा, लेकिन गणित बड़ा
अगर किसी बड़े रेलवे स्टेशन पर रोज़ाना हजारों बोतलें बिकती हैं, तो हर बोतल पर लिया गया अतिरिक्त 1 रुपया मिलकर लाखों रुपये की अतिरिक्त कमाई में बदल सकता है। सवाल यह है कि जब सरकार ने कीमत घटाई है, तो उसका फायदा आम जनता तक क्यों नहीं पहुंच रहा?
उपभोक्ता अधिकारों पर सवाल
उपभोक्ता अधिकारों की दृष्टि से यह मामला गंभीर है। यदि MRP 14 रुपये तय है, तो उससे अधिक कीमत वसूलना नियमों के खिलाफ है। लेकिन चिल्लर की कमी का बहाना बनाकर खुलेआम 15 रुपये वसूले जा रहे हैं।
जवाबदेही किसकी?
क्या संबंधित विभाग इस पर निगरानी रख रहा है?
क्या रेलवे प्रशासन या स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी है? और अगर है, तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
यह सिर्फ 1 रुपये का मामला नहीं है, बल्कि व्यवस्था और पारदर्शिता का सवाल है।






