राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में “राइट टू रिकॉल” (Right to Recall) की जोरदार मांग उठाते हुए राजनीतिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। उनके भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और इस मुद्दे पर देशभर में बहस शुरू हो गई है।
सदन में बोलते हुए चड्ढा ने कहा कि लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में एक बार चुने जाने के बाद कई जनप्रतिनिधि अपने वादों को भूल जाते हैं और जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रहते। उन्होंने तर्क दिया कि यदि किसी प्रतिनिधि का प्रदर्शन खराब है या वह जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा, तो मतदाताओं को उसे कार्यकाल के बीच में ही वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि यदि किसी क्षेत्र के लगभग 35–40 प्रतिशत मतदाता हस्ताक्षर करके असंतोष जताएं, तो उस प्रतिनिधि के खिलाफ “राइट टू रिकॉल” प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। चड्ढा ने कहा कि इससे राजनीति में जवाबदेही बढ़ेगी, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और जनप्रतिनिधि लगातार जनता से जुड़े रहने के लिए मजबूर होंगे।
हालांकि, कुछ सांसदों ने इस प्रस्ताव को जटिल बताते हुए कहा कि इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है और चुनावी खर्च भी बढ़ेगा।
फिलहाल यह मांग औपचारिक विधेयक के रूप में पेश नहीं हुई है, लेकिन चड्ढा के बयान ने लोकतांत्रिक सुधारों को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।







