देश की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा आज आम आदमी बन चुका है। हाल के आंकड़ों के अनुसार लगभग 11 लाख करोड़ रुपये का टैक्स आम नागरिकों ने भरा है, जबकि बड़े उद्योगपतियों की ओर से करीब 9 लाख करोड़ रुपये का टैक्स जमा हुआ। यानी देश चलाने की असली ताकत मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग ही है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि इतना टैक्स देने के बाद भी आम आदमी को बदले में क्या मिल रहा है? सड़कों पर खुले गड्ढे, टूटी व्यवस्था और जानलेवा लापरवाही।
कुछ ही दिनों पहले राजधानी के रोहिणी इलाके में 32 वर्षीय बिहार का एक मजदूर खुले मैनहोल में गिर गया। कई घंटे बाद उसकी लाश मिली। यह घटना रोहिणी में हुई, जिसने नगर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
इसी तरह उत्तर प्रदेश के कानपुर में भी दर्दनाक हादसा सामने आया। यहां बाइक सवार धीरेंद्र नामक युवक सड़क किनारे बने गहरे गड्ढे और दलदल में गिर गया। लगभग 12 घंटे तक फंसे रहने के कारण उसकी मौत हो गई।
ये घटनाएं केवल हादसे नहीं, बल्कि व्यवस्था की लापरवाही का प्रतीक हैं। जिस देश को आम आदमी के टैक्स से चलाया जा रहा है, उसी आम नागरिक को सुरक्षित सड़क, साफ नाली और बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि नगर निकायों की लापरवाही, भ्रष्टाचार और जिम्मेदारी तय न होने की वजह से ऐसे हादसे बार-बार हो रहे हैं।
अब बड़ा सवाल यही है— आखिर कब तक आम आदमी टैक्स भी देता रहेगा और अपनी जान भी गंवाता रहेगा? क्या सरकारें केवल राजस्व लेने तक सीमित रहेंगी, या नागरिकों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता देंगी?







