नई दिल्ली: नीट पीजी में रिजर्व कैटेगरी के लिए -40 मार्क्स तक कट-ऑफ ने सुप्रीम कोर्ट की बेंच को हैरान कर दिया। जस्टिस पामिदिघंटम नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे ने सवाल उठाया, “हमें यह देखकर हैरानी हो रही है कि यह तरीका क्यों अपनाया गया।” कोर्ट ने सीधे पूछा कि क्या मानकों के साथ समझौता किया जा रहा है, जबकि ये सभी उम्मीदवार रेगुलर डॉक्टर हैं।
वकील ने जवाब दिया कि कट-ऑफ कम करने का मकसद केवल पोस्ट ग्रेजुएशन की सीट्स खाली न रह जाएँ। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। छात्रों और डॉक्टर्स में असंतोष बढ़ा है, क्योंकि योग्यता को पूरी तरह अनदेखा कर केवल सीट भरने के लिए यह तरीका अपनाया गया।
13 जनवरी को नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज ने यह विवादास्पद फैसला लिया। इस कदम से न केवल योग्य उम्मीदवारों की अहमियत घटती दिख रही है, बल्कि भविष्य के डॉक्टरों की दक्षता और भरोसेमंदता पर भी प्रश्नचिन्ह लगते हैं। सोशल मीडिया पर छात्र, विशेषज्ञ और डॉक्टर्स तीखे शब्दों में अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं।
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर हैं, जो यह तय करेगा कि क्या मेडिकल शिक्षा में मानकों के साथ समझौता करना स्वीकार्य है या नहीं। यह मामला न सिर्फ नीट पीजी की कट-ऑफ, बल्कि भारत की मेडिकल शिक्षा के भविष्य की दिशा तय करेगा।







